उल्लेखनीय है कि स्थानीय अदालत में दायर याचिका में दावा किया गया कि जिस जगह पर मस्जिद है, वहां पहले एक मंदिर था। अदालत के आदेश से ही सर्वे टीम मस्जिद पहुंची थी। हालांकि यह भी है कि कुछ दिन पूर्व जब यहां प्रारंभिक सर्वे किया गया था, तभी तनाव के कुछ संकेत मिले थे। इसके बावजूद अगर व्यापक सर्वे के दौरान एहतियाती उपाय नहीं किए गए, तो इसमें गलती पुलिस प्रशासन की ही है। दूसरी बात, सर्वे का जिस तैयारी के साथ विरोध हुआ, हथियारबंद उपद्रवियों ने पहले सीसीटीवी कैमरों को तोड़ा, ताकि उनकी पहचान न हो सके, उससे तो यही लगता है कि इसकी तैयारी पहले से ही थी। लेकिन स्थानीय खुफिया विभाग को इसकी भनक तक नहीं लग सकी, जिससे सवाल तो पैदा होते ही हैं। पहले भी कई मामलों में अलग-अलग प्रदेशों में ऐसी घटनाएं हुई हैं, जब भीड़ ने प्रशासनिक अमले द्वारा की जा रही कानूनी कार्रवाई में दखल देने की कोशिश की और हिंसक स्थितियां बनीं।
संभल प्रशासन ने उनसे कोई सबक नहीं लिया। यह पूरी घटना इसलिए भी क्षोभकारी है कि उपद्रवी तत्व अगर इस तरह सुनियोजित हिंसा को अंजाम दे सकते हैं, तो वे इसे सामाजिक सद्भाव नष्ट करने की सीमा तक ले जाने की भी कोशिश कर सकते हैं। लिहाजा इस तरह की घटनाएं सामाजिक व सांस्कृतिक एकता और एकजुटता की भावना के लिए भी गंभीर खतरा हो सकती हैं। विपक्षी दल भले ही इसका दोष किसी पर भी मढ़ें, लेकिन तथ्य यही है कि अदालत के आदेश पर ही टीम सर्वे करने गई थी, जो एक नियमित विधिसम्मत प्रक्रिया है। 1991 का पूजा स्थल अधिनियम भी ऐसी जगहों के सर्वेक्षण की अनुमति देता है। अगर कोई समुदाय इसे अपने अधिकारों में हस्तक्षेप मानता है, तो उसके लिए भी कानूनी रास्ते खुले हैं, क्योंकि संविधान हर नागरिक को समानता, सम्मान और सुरक्षा का अधिकार देता है। लेकिन पत्थरबाजी का अधिकार किसी को नहीं है। दोषियों को सजा मिले, साथ ही, उपचुनावों के नतीजे सामने आने के दो दिन बाद हुई इस घटना के बहाने सामाजिक ताना-बाना नष्ट करने की ताक में बैठे असामाजिक तत्व कामयाब न हो पाएं, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।