आजकल दुनिया भर में शाकाहार की लहर चली हुई है। अधिकांश बड़े लोग, जिनमें नेता, अभिनेता, व्यापारी आदि शामिल हैं, अपने शाकाहारी होने की घोषणा काफी गर्वपूर्वक करते हैं, और लोगों को शाकाहारी बनने के फायदे बताते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के तो शाकाहारी होने की बात जगजाहिर है। जब वह विदेश जाते हैं, तो अक्सर उनका रसोइया साथ जाता है, ताकि उनके लिए शाकाहारी भोजन बना सके। जानवरों के लिए काम करने वाली संस्था पेटा भी तो अक्सर लोगों से शाकाहारी होने का अनुरोध करती ही रहती है। मेनका गांधी भी इन अभियानों का समर्थन करती रही हैं। इस लेखिका के एक मुसलमान मित्र पूरी तरह से शाकाहारी थे। वह रेड मीट ही नहीं, चिकन और मछली खाने से भी परहेज करते थे। अपने देश में ऐसे और भी लाखों-करोड़ों लोग होंगे ही।
यहां देखने की बात यह है कि जो भी लोग शाकाहारी हैं, वे अपनी रुचि के कारण ऐसे हुए हैं, किसी दबाव के कारण नहीं। खान-पान की आदतों को दबाव से नहीं बदला जा सकता। एक परिवार में ही जितने सदस्य होते हैं, उनकी खान-पान की अभिरुचियां अलग-अलग होती हैं। जब एक परिवार में यह आलम है, तो पूरे देश की खान-पान की रुचियों को भला कैसे एक जैसा बनाया जा सकता है? वैसे भी खान-पान हमारे पारिस्थितिकीय तंत्र से तय होता है। जहां अन्न बहुतायत से पैदा होता है, दूध-दही का उत्पादन भारी मात्रा में होता है, वहां शाकाहारी होना आसान है। जैसे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। मगर यदि पहाड़ों पर रहने वालों या समुद्र तट पर बसे लोगों या पूर्वोत्तर के लोगों से शाकाहारी होने की उम्मीद करने लगें, तो यह संभव ही नहीं है। इसी तरह शाकाहार और मांसाहार, दोनों से हमारी अर्थव्यवस्था भी जुड़ी है। यदि पूरा देश शाकाहारी हो जाए, तो न तो हमारे पास इतना अन्न है और न ही इतनी साग-भाजी, और न ही अन्य संसाधन। यही नहीं, जिन पशुओं से मांस प्राप्त होता है, मांसाहार एक तरह से उनकी आबादी को भी नियंत्रित करता है। वरना तो पूरे देश में मुर्गे-मुर्गियां और बकरियां ही बकरियां दिखेंगी, जो आधे से ज्यादा अन्न और वनस्पतियों को भी चट कर जाएंगी। हमारे यहां तो मशहूर श्लोक है ही- जीव जीवस्य भोजनम्। यानी कि मत्स्य न्याय, जिसके तहत हर बड़ी मछली अपने से छोटी मछली को खाती है।
जगदीश चंद्र बसु ने साबित किया था कि पेड़-पौधों में भी जान होती है। इस हिसाब से शाकाहार भी एक तरह से दूसरों की जान लेना ही है, चाहे वे सब्जियां हों, फल हों या दूध-दही हो। वैसे भी सरकारों को यह फैसला करने का हक किसने दिया कि वे यह तय करने लगें कि कौन क्या खाता है, कैसे रहता है।
पुराने जमाने में राजा यदि वैष्णव होता था, तो पूरी प्रजा वैष्णव हो जाती थी। यदि राजा शैव या शाक्त होता था, तो लोग भी उसी के अनुयायी हो जाते थे। आज सरकारें शाकाहार को बढ़ावा दे रही हैं, और पुराने जमाने के राजाओं की तरह लोगों से उम्मीद कर रही हैं कि वे उनकी बात मानेंगे। कल को मान लीजिए कोई ऐसी सरकार आ गई, जो मांसाहार को बढ़ावा देने लगे, तो क्या सभी को मांसाहारी होना होगा?
दुनिया भर में वे ही सरकारें और नेता अच्छे माने जाते हैं, जो लोगों के निजी जीवन पर नहीं बोलते। उनमें ताक-झांक नहीं करते। उन्हें अपनी सत्ता की लाठी से हांकने का प्रयत्न नहीं करते, क्योंकि लोकतंत्र में लोग इस बात को कभी नहीं भूलते कि किसने कब उनके जीवन को दूभर बनाया था। वोट देते वक्त वे इस बात का बदला जरूर लेते हैं। सरकारों को वर्ग विशेष के दबाव में नहीं आना चाहिए। सांप्रदायिकता के बढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी है।