मेरा कोलकाता लौटना हुआ। इसे मैं कोलकाता जाना नहीं कहूंगी, कोलकाता लौटना कहूंगी। लगभग दो दशक तक किसी जगह में निषिद्ध कर दिए जाने के बाद उस प्रतिबंधित दरवाजे का खुलना मेरे लिए लौटना ही है, जाना नहीं। कभी कोलकाता में रहने के लिए मैं दौड़ी चली आई थी। कोलकाता छोड़ने के लिए बाध्य कर दिए जाने के बाद मैं यूरोप और अमेरिका गई, लेकिन आखिरकार मैं भारत में ही रह गई। पर, एक देश में रहते हुए अपनी भाषा के इलाके में मेरा जाना प्रतिबंधित था, इससे अजूबा निर्वासन और क्या हो सकता था!
उस्मान गनी मल्लिक कई वर्षों से मुझे कोलकाता बुला रहे थे। वह एक प्रगतिशील मुस्लिम हैं। पहले भी उन्होंने मुझे कोलकाता आमंत्रित किया था, पर सुरक्षा कारणों के चलते यह संभव नहीं हो पाया था। इस बार जब उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार से इस बारे में गुजारिश की, तो सरकार मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने को तैयार हो गई। कोलकाता के रवींद्र सदन में मेरे स्वागत का प्रबंध भी उस्मान और उनके साथियों ने किया था। मेरी इच्छा थी कि मंच पर सिर्फ कवि-लेखकों की ही मौजूदगी रहे। मेरे शुभाकांक्षी कवि-लेखकों की सूची भी मैंने आयोजक को दे दी थी। अंत में जब मंच पर मौजूद लोगों की सूची बनी, तो उसमें लेखक शीर्षेंदु मुखोपाध्याय को छोड़कर ज्यादातर दूसरे लोग मौजूदा सरकार या उनकी राजनीति से ही जुड़े हुए थे। उनमें से ज्यादातर लंबे समय से मेरे शुभचिंतक थे और कोलकाता में मेरे लौटने के पक्ष में थे।
अपने भाषण में मैंने कहा, ‘आज मैं कोलकाता लौट आई हूं। यह वाक्य बोलते हुए मुझे उन्नीस साल लग गए। लंबी प्रतीक्षा के बाद कोलकाता की जमीन पर खड़े होकर मुझे महसूस हो रहा है कि मैं सिर्फ एक शहर में नहीं, बल्कि अपने खोए हुए जीवन के एक अध्याय में लौट आई हूं। अपने प्रिय और श्रद्धेय साहित्यकार शीर्षेंदु मुखोपाध्याय को मैं विशेष रूप से धन्यवाद देना चाहती हूं। मेरी तरह उनकी जन्मभूमि भी मैमनसिंह (बांग्लादेश) है। मानचित्र ने हमारी जन्मभूमि को दो हिस्सों में बांट जरूर दिया, पर हमारी साझा स्मृतियों और भाषा को वह नहीं बांट पाया। एक लेखक को अपनी भाषा के शहर में लौटने के लिए अगर पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़े, तो मेरे लिए यह अत्यंत वेदनादायक है। मैं यहां किसी राजनीतिक दल के लिए बोलने नहीं आई हूं। न ही किसी राजनीतिक दल को पराजित करने आई हूं। मैं स्त्रियों के अधिकार, मानवाधिकार, धर्मनिरपेक्षता, तर्कवाद, उदार चिंतन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में बोलने आई हूं। मैं सिर्फ यह चाहती हूं कि कोलकाता में आवाजाही के मेरे अधिकार को रोका न जाए। आज अगस्त की पहली तारीख है। अगस्त मेरे जन्म का महीना है। अगस्त मेरे निर्वासन का महीना भी है। और, आज से अगस्त मेरे लौटने का महीना भी है। आठ अगस्त, 1994 को बांग्लादेश की तत्कालीन सरकार ने मुझे देश छोड़ने पर बाध्य किया था। उसके बाद कई सरकारें आईं। लेकिन, मेरे लिए दरवाजा नहीं खुला। राष्ट्र ने बेशक मुझे देश से बाहर कर दिया, पर मेरे अंदर के देश को वह मुझसे छीन नहीं पाया। बांग्ला भाषा ही मेरा स्वदेश है-इस स्वदेश के सहारे मैं पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक जाती रही हूं। एक बंगाल में मेरा जन्म हुआ। दूसरे बंगाल में मुझे मेरा खोया हुआ घर मिला था। पर, आखिरकार एक बंगाली लेखक के लिए दो बंगाल में कहीं भी एक छोटा-सा घर नसीब न हुआ। यूरोप ने मुझे नागरिकता, सुरक्षा और आश्रय दिया, इसके लिए मैं कृतज्ञ हूं। लेकिन, नागरिकता और अपनापा एक चीज नहीं है। सुरक्षित आवास कहीं भी मिल सकता है, लेकिन घर तो भाषा, स्मृति, संस्कृति और मनुष्य के प्रेम से ही बनता है...।’
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने मेरा स्वागत किया। उनकी सरकार ने मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी ली। इसके लिए मैं कृतज्ञ हूं। भारत में इससे पहले केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने ही इस तरह मेरा सार्वजनिक अभिनंदन किया था। यह सरकार जनता के वोट से चुनी गई सरकार है। कोई सरकार आपके लिए अगर कोई अच्छा काम करती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप उसके विचारों के समर्थक हो जाएं। मेरी विचारधारा क्या है, यह मैं अपनी कविता में बता चुकी हूं-दक्षिण में नहीं हूं, वाम में नहीं/मैं हूं अपनी मिट्टी में। इसके बावजूद, पश्चिम बंगाल के कुछ कम्युनिस्टों ने मेरे खिलाफ इस तरह विष वमन किया, मानो कोलकाता लौटने के लिए मैंने भाजपा या आरएसएस की मदद ली। यह बात सच नहीं है। मुझे कोलकाता लौटाने वाले उस्मान गनी मल्लिक और उनके संगी-साथी थे। सरकार या किसी राजनीतिक दल ने मेरे लिए एक पैसा भी खर्च नहीं किया। मुझ पर जो आरोप लगाए गए, वे जाहिर है, नए नहीं हैं। बहुत साल पहले लज्जा लिखकर जब मैंने बांग्लादेश में मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं के अत्याचार के विरोध में प्रतिवाद दर्ज किया था, तब भी यह कहा गया था कि भाजपा या आरएसएस ने मुझसे यह उपन्यास लिखवाया है। बहुतों को इस पर विश्वास करने में भी परेशानी होती है कि एक नारी अपने विवेक, अनुभव, राजनीतिक व नैतिक बोध से कुछ लिख सकती है। स्त्री को समान अधिकार, मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सांप्रदायिक सद्भाव, मानवीयता, उदारता, विषमताहीन समाज, धर्मनिरपेक्षता, समता और ईमानदारी मेरे भाषण व कविता पाठ के विषय थे। पिछले चालीस साल से मैं इन्हीं सब पर बात करती रही हूं। सरकारें बदल गईं, देश बदल गया, मेरा पता बदल गया, लेकिन मेरे विचार नहीं बदले हैं। कोलकाता लौटने का अर्थ मेरे लिए एक पुराने अन्याय का मामूली सुधार भी है।
कोलकाता लौटने पर एक दूसरे दृश्य ने मुझे सबसे ज्यादा आनंदित किया। रवींद्र सदन के बाहर दोपहर से रात तक सैकड़ों लोग खड़े थे। उनके हाथों में निमंत्रण पत्र नहीं था। वे किसी दल के नेता, मंत्री या विशिष्ट अतिथि भी नहीं थे। वे साधारण लोग थे। सिर्फ मेरी एक झलक पाने के लिए वे घंटों इंतजार कर रहे थे। कोई मंच, कोई सम्मान या कोई स्मृतिचिह्न नहीं-आम लोगों का यह प्यार ही कोलकाता में मेरे होने की सबसे बड़ी स्वीकृति था।
मैं कोलकाता से कुछ दूर पानिहाटी में बेगम रुकैया की समाधि स्थल तक गई। वही रुकैया, जिन्होंने सौ साल पहले स्त्री शिक्षा, उनकी आजादी और मुक्ति की बात कही थी। उनकी समाधि पर पहुंचकर मैंने उन्हें श्रद्धांजलि दी। हम दोनों के बीच भले ही लगभग एक सदी का अंतराल हो, दोनों का जीवन पृथक-पृथक हो, पर लड़ाई का तरीका अब भी कमोबेश पहले जैसा ही है।
अब मैं कोलकाता में एक अतिथि के रूप में नहीं, घर की ही स्त्री के रूप में लौटना चाहती हूं। निर्वासन ने मेरा घर भले ही छीन लिया हो, पर घर लौटने की आकांक्षा पर वह विराम नहीं लगा पाया है। मैं जितने भी दिन तक जिंदा रही, पृथ्वी के जिस भी कोने में रही, लिखती रहूंगी। सच कहती रहूंगी।