उल्लेखनीय है कि झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्रों के 26 दिन तक चले विरोध-प्रदर्शन के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की अगुवाई वाली सरकार ने कई अधिसूचनाएं जारी करते हुए स्पष्ट किया कि रद्द की गई परीक्षाओं में वे भी शामिल हैं, जो आउटसोर्स एजेंसी द्वारा आयोजित की गई थीं। दोषपूर्ण परीक्षा प्रक्रिया को बचाने के बजाय उसकी निष्पक्ष जांच करना निस्संदेह सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन, समस्या तब पैदा होती है, जब पूरी प्रक्रिया में हुई कथित गड़बड़ी का खामियाजा उन अभ्यर्थियों को भी भुगतना पड़े, जिनकी इसमें कोई भूमिका नहीं थी। यही वजह है कि सरकार के इस कदम से उन उम्मीदवारों में घबराहट है, जिन्होंने ये परीक्षाएं सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की थीं और विभिन्न सरकारी विभागों में नियुक्ति भी पा ली थी।
दरअसल, झारखंड का मौजूदा संकट केवल कुछ परीक्षाओं के रद्द होने का मामला नहीं है। यह तो उस गहरे अविश्वास का परिणाम है, जो पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवाओं के मन में पैदा हुआ है। लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, परीक्षा देते हैं, नतीजों की प्रतीक्षा करते हैं और फिर नियुक्ति की उम्मीद करते हैं। लेकिन, यह पूरी प्रक्रिया किसी अनियमितता के चलते अचानक रद्द हो जाए, तो उनके सामने केवल एक नई परीक्षा देने की चुनौती भर नहीं होती, बल्कि बढ़ती उम्र, आर्थिक दबाव और वर्षों की मेहनत व्यर्थ जाने का भय भी होता है।
ऐसे में, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि परीक्षाएं रद्द करने के बाद नई परीक्षाओं की प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक न खिंचे, बल्कि समयबद्ध हो। जिन अभ्यर्थियों ने निर्धारित नियमों के तहत परीक्षा उत्तीर्ण की है और जिनकी नियुक्ति हो चुकी है, उनके मामलों में कानून व न्याय के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप सावधानीपूर्वक निर्णय लिया जाना चाहिए। किसी निर्दोष छात्र को केवल इसलिए दंडित नहीं किया जा सकता कि व्यवस्था के किसी दूसरे हिस्से में गड़बड़ी हुई थी। लिहाजा, सरकार को उन अभ्यर्थियों के साथ संवाद करना चाहिए, जिनकी नियुक्तियां हो चुकी हैं। इस मामले में जल्दबाजी में कोई ऐसा फैसला नहीं होना चाहिए, जिससे बाद में नई कानूनी और प्रशासनिक जटिलताएं पैदा हों।