पहली रणनीति, दक्षिणी राज्यों के फिल्म उद्योग को द्रमुक के प्रमुख परिवार के नियंत्रण से मुक्त कराना। वे 'रेड जाइंट मूवीज' की आलोचना करते हैं, क्योंकि आरोप है कि यह कंपनी प्रोडक्शन और फाइनेंस से लेकर डिस्ट्रीब्यूशन तक के उद्योग के नियमों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करती है और सिनेमा हॉल पर अपनी चुनी हुई फिल्मों (जिनमें उनके पसंदीदा हीरो-हीरोइन होते हैं) को दिखाने का दबाव बनाती है। दूसरी रणनीति यह है, राजनीतिक तौर पर द्रमुक पार्टी को कमजोर करना। इस मिशन को पूरा करने का एक और असर यह हुआ है कि विजय के साथ काम करने वाले दूसरे हीरो भी द्रमुक के प्रमुख परिवार पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए विजय (जिन्हें वे अन्ना यानी बड़ा भाई कहते हैं) के दिखाए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। डिजिटलाइजेशन के बढ़ने से सिनेमा उद्योग को, और खासकर विजय को अपने प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती देने में काफी मदद मिली, खासकर ओटीटी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये।
45 साल से ज्यादा उम्र के कई फिल्मी हीरो (जैसे अजित कुमार, धनुष, विजय सेतुपति, सूर्या, शिवकार्तिकेयन, सरथकुमार, कार्थी और विक्रम) फिल्मों की दुनिया से हटकर तमिल समाज की सेवा में लग गए हैं। वे बड़े पैमाने पर समाज सेवा के काम कर रहे हैं, जिसमें शिक्षा संस्थानों और अस्पतालों पर ध्यान देना और दूर-दराज के गांवों में उपेक्षित और पिछड़े परिवारों को आर्थिक मदद देना भी शामिल है। वही हीरो, जिन्होंने कभी पर्दे पर विजय को टक्कर दी थी, अब गरीबों की सेवा करने में विजय के दिखाए जज्बे को अपना रहे हैं। 1990 के दशक के आखिर में, जब रजनीकांत और कमल हासन जैसे सुपरस्टार्स का दबदबा था, तब भी विजय अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जो छात्रों की कॉलेज की पढ़ाई में मदद करते थे। इससे नई पीढ़ी के लोग आकर्षित हुए। फिल्म इंडस्ट्री में आने वाले कई नए कलाकार अब अपने फैन क्लब के जरिये राजनीति में आ रहे हैं और खुद समाज सेवा के काम कर रहे हैं। कॉलीवुड की यह नई पीढ़ी न सिर्फ द्रविड़ विचारधारा को अपने से दूर रखना चाहती है, बल्कि राज्य की सियासत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और इंडियन नेशनल कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के प्रवेश को भी रोकना चाहती है।
क्या आने वाले वर्षों में तमिलनाडु की सियासत में फिल्मी दुनिया के लोगों का क्रेज और बढ़ेगा? अगर बड़े पर्दे के कलाकार राजनीति में आ जाते हैं, तो एमके स्टालिन और एडप्पाडी पलानीस्वामी जैसे बड़े नेताओं और उनकी पार्टी के पदाधिकारियों के सामने बेरोजगारी का खतरा पैदा हो सकता है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के कुछ बड़े नेता पहले से ही इस बात को लेकर चिंतित हैं। अगर टीवीके सरकार मजबूत होती है, तो पारंपरिक राजनीतिक मंच सिमट जाएंगे और उनकी जगह नए फिल्मी सितारे ले लेंगे।
विजय ने तमिलनाडु की राजनीति कैसे बदली? 1972 में एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) के राजनीति में आने और तुरंत अपनी पार्टी 'ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' (अन्नाद्रमुक) बनाने (जिसे उन्होंने गरीबों के कल्याण और द्रविड़ सिद्धांतों पर आधारित किया था) के कई दशकों बाद, अभिनेता से राजनेता बने विजय ने दो फरवरी 2024 को आधिकारिक तौर पर अपनी राजनीतिक पार्टी 'तमिलगा वेट्री कड़गम' (टीवीके) लॉन्च की।
क्या फिल्मी हस्तियों का राजनीति में आना यह दिखाता है कि 60 साल पुरानी द्रविड़ विचारधारा का असर कम हो रहा है? क्या फिल्मी संस्कृति के इस बढ़ते चलन से द्रविड़ और हिंदुत्व, दोनों विचारधाराओं को झटका लगेगा? इस बात का स्पष्ट जवाब 'हां' है। 1920 और 1930 के दशक में मद्रास प्रेसिडेंसी में जस्टिस पार्टी (आधिकारिक तौर पर साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन) की मुख्य विचारधारा गैर-ब्राह्मणों के उत्थान, सामाजिक न्याय और समुदायों के प्रतिनिधित्व पर केंद्रित थी। लेकिन द्रविड़ राजनीति का असर तब कम होने लगा, जब ई.वी. रामासामी (पेरियार) ने द्रविड़ कड़गम का गठन किया।
यह स्थिति तब और कमजोर हो गई, जब द्रमुक के संस्थापक-नेता सीएन अन्नादुरई राज्यसभा के लिए चुने गए और उन्होंने अलग होने की मांग छोड़ दी। 1972 में, एमजी रामचंद्रन ने अन्नाद्रमुक बनाई और द्रविड़ राजनीति में ईश्वर की पूजा को शामिल किया। ब्राह्मण चेहरा रहीं जयललिता ने अपने कार्यकाल के दौरान द्रविड़ सिद्धांतों को और कम महत्व दिया। एम करुणानिधि के निधन के बाद, एमके स्टालिन के समर्थक मंदिरों में जाने लगे। अब, टीवीके के विजय ने पुरानी द्रविड़ विचारधारा की बची-खुची बंदिशों को भी खत्म कर दिया है। विजय ने अपने मुख्य प्रशासनिक ढांचे में दो ब्राह्मण चेहरों को भी शामिल किया है।
टीवीके पार्टी के आधिकारिक नीतिगत दस्तावेज एक ऐसी आध्यात्मिक सोच को अपनाते हैं, जिसमें किसी सर्वोच्च शक्ति में विश्वास शामिल है—यह एक सदी से चली आ रही पारंपरिक, नास्तिक द्रविड़ विचारधारा से एकदम अलग है। क्या इस बदलाव के कारण भविष्य के फिल्मी हीरो अपना रुख बदलेंगे और सीधे हिंदुत्व की राजनीति अपनाएंगे? इसका एक अहम उदाहरण रजनीकांत हैं, जिनके कॅरिअर के दौरान दक्षिणपंथी 'आध्यात्मिक राजनीति' की ओर झुकाव ने अक्सर लोगों के मन में हिंदुत्व के साथ उनके जुड़ाव को लेकर उलझन पैदा की। ऐसा ही सांस्कृतिक बदलाव उनके पूर्व दामाद धनुष में भी दिखता है, जो बड़ी एक्शन फिल्म 'ओम' में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। लोगों का अभिवादन करने का धनुष का अपना तरीका अक्सर 'ओम नमः शिवाय' कहना रहा है। आप चाहे किसी भी नजरिये से देखें या भविष्य के बारे में कुछ भी सोचें, एक बात तो पक्की है: एक करिश्माई नेता के तौर पर विजय ने न सिर्फ अपने साथी हीरो की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को बदला है, बल्कि खुद तमिलनाडु के वैचारिक ढांचे को भी बदल दिया है।