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तमिल अस्मिता और चुनाव: लोग तमिल के रूप में वोट करते हैं या धर्म और जाति के नाम पर

भास्कर साई
Updated Mon, 21 Oct 2019 08:41 AM IST
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तमिल अस्मिता - फोटो : a

देश के बाकी हिस्सों की नजर जहां महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों पर लगी है, वहीं तमिलनाडु दो विधानसभा सीटों पर उपचुनावों में व्यस्त है। तमिलनाडु के उत्तरी इलाके में स्थित विक्रावंडी और दक्षिणी इलाके में स्थित नांगुनेरी आज होने वाले चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है। राज्य के लोगों की निगाहें इन्हीं उपचुनावों पर हैं, क्योंकि दांव ऊंचा है।



लोकसभा चुनाव और राज्य के 22 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के बाद तमिलनाडु इन दो विधानसभा सीटों के उपचुनाव में दूसरे राजनीतिक संघर्ष का साक्षी बन रहा है। विक्रावंडी में जहां सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक और मुख्य विपक्षी दल द्रमुक के बीच सीधी लड़ाई है, वहीं नांगुनेरी में अन्नाद्रमुक ने द्रमुक के गठबंधन सहयोगी कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। डीएमडीके और पीएमके जैसी पार्टियां अन्नाद्रमुक का समर्थन कर रही हैं, जबकि टीटीवी दिनाकरन की एएमएमके और अभिनेता कमल हासन की एमएनएम पार्टी लड़ाई से बाहर हो गई हैं।


इन दोनों सीटों के नतीजे से तमिलनाडु की राजनीति में बेशक कोई बड़ा बदलाव आने वाला नहीं है, क्योंकि पलानीस्वामी सरकार के पास बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा है। इस साल अप्रैल में 22 सीटों पर हुए उपचुनाव में से 13 सीटें जीतने के बावजूद द्रमुक को बहुत फायदा नहीं हुआ। हालांकि विक्रावंडी और नांगुनेरी सीटें जीतना दोनों खेमों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से लंबित स्थानीय निकाय के चुनावों की घोषणा किसी भी समय हो सकती है, इसलिए अन्नाद्रमुक और द्रमुक के आलाकमान इन उपचुनावों को उसका रिहर्सल मान रहे हैं। उन्हें यह भी लगता है कि इन दोनों निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं का मूड 2021 के विधानसभा चुनावों में भी दिखाई देगा। इसलिए अन्नाद्रमुक और द्रमुक के शीर्ष नेताओं ने दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में भारी प्रचार किया।


स्टालिन और मुख्यमंत्री पलानीस्वामी, दोनों इन दोनों सीटों पर जीत का दावा कर रहे हैं और एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। दोनों पार्टियों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए भी कई कदम उठाए हैं। अतीत की तरह दोनों पार्टी प्रमुखों ने वन्नियार बहुल विक्रावंडी और नाडार बहुल नांगुनेरी में जाति कार्ड खेला। मतदाताओं को पैसे बांटने के आरोपों के बीच द्रमुक के एक विधायक को पैसे के साथ पकड़ा गया और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। हालांकि विधायक श्रवण कुमार ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने ये पैसे अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए रखे थे।


अतीत में विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाने वाले अन्नाद्रमुक नेता और वरिष्ठ मंत्री राजेंद्र बालाजी मतदान से ठीक पहले फिर एक विवाद में फंस गए हैं। कथित तौर पर उन्होंने बयान दिया कि तमिलनाडु में भी कश्मीर जैसी स्थिति हो सकती है, जहां मुसलमानों को दरकिनार किया गया। बताया जाता है कि उन्होंने यहां तक कहा कि उन्हें मुस्लिमों के लिए क्यों कुछ करना चाहिए, जब वे अन्नाद्रमुक को वोट ही नहीं देते। मंत्री ने हालांकि ऐसे बयान से इन्कार करते हुए कहा कि मुस्लिम उनके मुख्य सहयोगी हैं और ऐसे आरोप द्रमुक से जुड़े कुछ संगठनों की करतूत है। मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया। उनका आरोप है कि मंत्री ने अल्पसंख्यकों की भावनाओं को चोट पहुंचाई है और सरकार को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। अब देखना है कि इसका असर मतदान पर पड़ता है या नहीं।


इस बीच स्टालिन और रामदौस के बीच जुबानी जंग भी छिड़ गई। चूंकि विक्रावंडी में वन्नियार वोट काफी हैं, इसलिए द्रमुक प्रमुख ने उस समुदाय को लुभाने के लिए कई वादे किए। पीएमके के संस्थापक को यह अच्छा नहीं लगा, जिनकी पार्टी खुद को वन्नियार समर्थक बताती है। कुछ दिन पहले स्टालिन ने धनुष की फिल्म असुरन देखी थी और उसकी प्रशंसा में ट्वीट किया था, जो जातिगत संघर्ष और जमीन पर अधिकार की बात करती है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा था-असुरन मात्र एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सबक है। फिल्म ने जातिवादी समाज पर सवाल उठाए हैं, जो पंचमी की जमीन (ब्रिटिश शासन के दौरान अनुसूचित जाति को दी गई जमीन) हड़पने की कोशिश करते हैं।' इसका करारा जवाब देते हुए रामदौस ने लिखा, 'मुझे उम्मीद है कि असुरन से सबक सीखते हुए स्टालिन वह भूमि, जिस पर मुरासोली (द्रमुक का आधिकारिक अखबार) भवन बना है, उसके मालिक को लौटा देंगे'। इसके बाद स्टालिन ने एक दस्तावेज जारी करते हुए कहा कि 'मुरासोली का कार्यालय उस जमीन पर बनाया गया है, जिस पर निजी स्वामित्व था। अगर रामदौस यह साबित कर दें कि यह पंचमी की जमीन है, तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते, तो वह और उनके बेटे राजनीति छोड़ दें।' लेकिन रामदौस ने मूल दस्तावेज जारी करने के लिए कहा, जिसके जवाब में स्टालिन ने कहा कि 'वह मुख्य संपत्ति के सभी दस्तावेज जारी करेंगे, अगर रामदौस और उनके पुत्र राजनीति छोड़ने के लिए आगे आएं।'


जाति, धर्म और अन्य सामाजिक-आर्थिक कारकों के चलते बंटे होने के बावजूद तमिल भाषा के नाम पर एकजुट हैं। वे उन लोगों का आदर करते हैं, जो उनकी भाषा, संस्कृति और परंपरा का आदर करते हैं। हाल ही में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी की थी, तब उन्होंने धोती और कमीज पहनी तथा तमिल भाषा में बोले थे। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की भी काफी प्रशंसा हुई, जब एक तमिल टीवी चैनल पर लिया गया उनका इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वह तमिल बोलते दिखे। इंटरव्यू लेने वाला जहां उनसे अंग्रेजी में सवाल कर रहा था, वहीं मनोहरलाल खट्टर धाराप्रवाह तमिल में उत्तर दे रहे थे। जब उनसे हरियाणा की तमिल आबादी के कल्याण की योजना के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि 'हरियाणा में जो तमिल आबादी है, वे हरियाणवी हैं और मेरे अपने लोग हैं।'
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जहां तक इन दो उपचुनावों की बात है, तो यह देखना होगा कि लोग तमिल के रूप में वोट करते हैं या धर्म और जाति के नाम पर। इसका जवाब 24 अक्तूबर को ही मिलेगा, जब नतीजे घोषित होंगे।

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