नीति आयोग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्व बैंक द्वारा जारी हमारे स्कूलों की सफलता-स्कूल शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक (एसईक्यूआई) ने फिर स्कूलों के प्रदर्शन के प्रति लोगों का ध्यान खींचा है। हमेशा की तरह अखबारों में प्रकाशित आंकड़े और सूचनाएं उन राज्यों पर केंद्रित हैं, जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है और जो पिछड़ गए हैं। उम्मीद के मुताबिक, गुणवत्ता के मामले में बीस बड़े राज्यों में केरल शीर्ष पर है। उसके बाद राजस्थान और कर्नाटक का स्थान है। उत्तर प्रदेश निचले पायदान पर है, जबकि जम्मू-कश्मीर और पंजाब का स्थान उससे ऊपर है।
स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के लिए एसईक्यूआई को विकसित किया गया था। इस सूचकांक में ऐसे संकेतक शामिल हैं, जो राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए सुधार लाने में मदद करेंगे। सूचकांक को संकेतकों के आधार पर विकसित किया जाता है, जिसे दो व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-सीखने के परिणाम, पहुंच, बुनियादी ढांचा और सुविधाएं तथा इच्छित नतीजे; और शासन की प्रक्रियाएं व सहायता परिणाम। सूचकांक का मूल उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी शिक्षा प्रणाली की स्थिति का आकलन करने के लिए एक तंत्र प्रदान करना है, ताकि उन्हें सुधारों के साथ-साथ अपने राज्य में शिक्षा मानकों की गुणवत्ता में सुधार के लिए बदलाव लाने में मदद मिल सके।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को रिपोर्ट के निष्कर्षों को आत्मनिरीक्षण के एक स्रोत के रूप में लेना चाहिए, जहां उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है और जिन क्षेत्रों में उन्हें और काम करने की आवश्यकता है। ये निष्कर्ष राज्यों के लिए उपकरण का कार्य कर सकते हैं, ताकि वे अपने स्कोर बढ़ा सकें और अपने राज्यों में शिक्षा प्रणाली से बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकें। यदि इनका विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग किया जाता है, तो आंकड़े के बिंदुओं का उपयोग शिक्षा नीति के उपायों को विकसित करने के लिए किया जा सकता है, जिसे एक बेहतर शिक्षा प्रणाली के लिए लागू किया जा सकता है। किसी को इस नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए कि उत्तर प्रदेश के स्कूल खराब हैं या सर्वेक्षण निष्कर्षों के कारण केरल सर्वश्रेष्ठ है। सूचकांक सीखने के परिणाम की ओर झुका हुआ है, जिसका मान (वेटेज) लगभग 38 फीसदी है। अपेक्षित परिणाम (इक्विटी आउटकम), जो अनुसूचित जाति (एससी) और सामान्य श्रेणी के छात्रों के बीच प्रदर्शन में 20 फीसदी वेटेज के अंतर को ध्यान में रखता है, उन राज्यों में असंतुलित होने के लिए बाध्य है, जहां इन दो श्रेणियों के छात्रों के प्रतिशत में व्यापक अंतर है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु जैसे राज्य में, जहां सामान्य श्रेणी के छात्रों का प्रतिशत कम है, सूचकांक में बेहतर परिणाम की उम्मीद होगी।
शासन प्रक्रियाओं और सहायता परिणाम के लिए करीब 30 फीसदी मान दिया गया है, जिसमें छात्र और शिक्षक की उपस्थिति, शिक्षक की उपलब्धता, प्रशासनिक पर्याप्तता, प्रशिक्षण, जवाबदेही और पारदर्शिता शामिल है। स्वाभाविक रूप से उच्च सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों की भागीदारी वाले राज्य के आंकड़े में ये परिणाम अलग-अलग होंगे।
सर्वेक्षण की सीमाएं- सीखने के परिणाम को ही लें, जिसमें सर्वेक्षण के निष्कर्षों के लिए दो ही विषय-गणित और भाषा को रखा गया है। प्रत्येक राज्य में पहली भाषा को लेकर अलग-अलग नीति और जोर है। उदाहरण के लिए केरल को देखें, जहां साक्षरता दर देश में उच्च है, यह स्वाभाविक है, कि जब भाषा सीखने की बात आती है, तो माता-पिता अपने स्कूली बच्चों की सहायता करने के लिए आगे आते हैं। लेकिन ऐसा उत्तर प्रदेश में नहीं है, जहां साक्षरता दर बहुत कम है।
इसके अलावा सर्वेक्षण से ही पता चलता है कि राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के वृद्धिशील प्रदर्शन के विश्लेषण में सीखने के परिणामों के आंकड़े को शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि नेशनल एचीवमेंट सर्वे, 2017 के ताजा चक्र से प्राप्त सीखने के परिणाम के आंकड़े टेस्ट आइटम, कवरेज और रिपोर्टिंग स्केल में बदलाव के चलते पूर्व चक्र के आंकड़े से तुलना करने योग्य नहीं हैं।
इसी तरह कई संकेतकों के लिए समय शृंखला आंकड़ों की कमी ने संकेतक, डोमेन और श्रेणीवार मान प्राप्त करने के लिए सांख्यिकीय तकनीक का उपयोग करने की टीम की क्षमता को सीमित कर दिया। इसके बजाय मानव संसाधन विकास मंत्रालय, इस क्षेत्र के विशेषज्ञों और राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों से परामर्श करके मान(वेटेज) लिए गए। ये निष्कर्ष कुछ हद तक सर्वेक्षण प्रक्रिया या मापदंडों के उपयोग की एकरूपता को दर्शाते हैं।
इसके अलावा स्थानीय सरकारों द्वारा किए गए नीतिगत बदलावों में योगदान करने वाले स्कूलों के प्रदर्शन के मूल्यांकन की समय सीमा को लेकर भी समस्या है। एक मामला दिल्ली सरकार द्वारा बुनियादी संरचना में सुधार के जरिये शिक्षा पर उच्च खर्च, शिक्षण सहायता के साथ-साथ स्कूलों और स्कूल जाने वाले बच्चों के माता-पिता के बीच संपर्क से भी संबंधित है। दिल्ली के स्कूलों में छात्रों की उत्तीर्णता प्रतिशत में वृद्धि के साथ-साथ स्कूली छात्रों में ड्रॉपआउट दर में कमी करने जैसे बदलावों को सर्वे में कारक नहीं बनाया गया है।
सर्वे के मुताबिक, अधिकांश संकेतक केवल सरकारी स्कूलों के प्रदर्शन को कवर करते हैं, कुछ ही संकेत सभी प्रकार के स्कूलों को। निष्कर्ष के नतीजों को प्रभावित करने में यह भी भूमिका निभाता है। राज्यों और सरकारों के लिए एसईक्यूआई के नतीजे एक गाइड के रूप में काम कर सकते हैं, जिसका इस्तेमाल वे अपनी शिक्षा नीति को बनाने और मूल्यांकन करने के लिए कर सकते हैं। इसका इस्तेमाल आंख मूंदकर रैंकिंग प्रदान करने के लिए नहीं करना चाहिए कि कौन बेहतर है, कौन खराब। आखिरकार शिक्षा परिणामों को मानकीकृत नहीं किया जा सकता, जब तक कि परिणाम वांछित और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के लिए समान न हो।