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अंकों की दौड़ में पिछड़ती प्रतिभा

Wed, 06 Jul 2016 08:06 AM IST
विनय कुमार पाठक
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विनय कुमार पाठक
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भारत में ज्यादातर छात्रों की मानसिकता कौशल में सुधार के बजाय परीक्षा में अच्छे अंक लाने पर केंद्रित रहती है। कुछ समय पहले पीयर्सन वॉयस ऑफ टीचर्स के एक सर्वे में जब इस बात का खुलासा हुआ, तो बहुत से लोग शायद इस तथ्य को स्वीकार करने से हिचक रहे होंगे। लेकिन अब बिहार और उत्तर प्रदेश में जिस तरह टॉपर घोटाले की खबरें आ रही हैं, उससे यह बात स्वीकार करने में बहुत हिचक नहीं होनी चाहिए। छात्रों को शुरू से ही एक ऐसे माहौल में ढाल दिया जाता है, जिसमें उनका ध्यान परीक्षा और उसके परिणाम पर ही टिका रहता है। हमें विचार करना होगा कि प्रतिभा का पैमाना क्या सिर्फ अच्छे अंक लाना ही है? यह भी देखना होगा कि टॉपर बनाने के ये कारखाने पनपते कैसे हैं? और इस बात की भी पड़ताल करनी होगी कि मानव संसाधन तैयार करने वाली शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत, जिसे आज लग्जरी आइटम के तौर पर खरीदा-बेचा रहा है, वह क्या हमारे छात्रों का भला कर पाएगी?
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ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो नीतिगत दायरे में आते हैं। आज जब नई शिक्षा नीति की बात हो रही है, तो इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार गुणवत्तापरक शिक्षा, नवाचार और अनुसंधान संबंधी आवश्यकताओं के परिवर्तनशील पहलुओं से निपटने के लिए नई शिक्षा नीति लाना चाहती है, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि इससे विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा एवं उद्योग जगत में श्रमशक्ति की कमी को दूर किया जा सकेगा। इससे पहले राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में बनाई गई थी और 1992 में संशोधित की गई थी। तब से अब तक अनेक बदलाव हुए हैं, जिसकी वजह से नीति में संशोधन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

जहां तक बात परीक्षा प्रणाली की है तो शिक्षाविदों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो बिहार में टॉपर घोटाले की घटना के बाद यूपी बोर्ड के टॉपर्स की जांच-परख की भी मांग कर रहा है। उनका तर्क भी ठीक ही लगता है कि बोर्ड परीक्षा में टॉप करने वाले तमाम परीक्षार्थी अचानक आगे की कक्षाओं में गुमनामी के अंधेरे में कैसे खो जाते हैं? दरअसल, आज जन-जन को गुणवत्तापरक शिक्षा मुहैया कराने के साथ-साथ परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली में भी सुधार जरूरी है। किताबों का बोझ कम करने के लिए स्नातक एवं परा-स्नातक स्तर पर चयन आधारित क्रेडिट सिस्टम होना चाहिए। यह ऐसी प्रणाली है, जिसके अंतर्गत सभी पाठ्यक्रमों के प्रत्येक वर्ष के क्रेडिट (श्रेयांक) निर्धारित कर दिए जाते हैं, जिसको पूरा करने के लिए न्यूनतम एवं अधिकतम समय निर्धारित किया जाता है। साथ ही ओपन इलेक्टिव विषय भी पाठ्यक्रम में शामिल होने चाहिए, जिससे छात्र रुचि के मुताबिक विषय चुन सकें। कौशल विकास के लिए पाठ्यक्रम में न्यूनतम समयावधि का प्रशिक्षण एवं इसके उपरांत व्यावहारिक कौशल के मूल्यांकन को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से भी फायदा हो सकता है।
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मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 48,547 प्राथमिक विद्यालय, 71,814 इंटरमीडिएट विद्यालय एवं लगभग 700 विश्वविद्यालय एवं उनसे संबद्ध 35,500 महाविद्यालय हैं। यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि ये संस्थान कौशल विकास जैसे आयाम पर कार्य कर रहे हैं। लगभग दो करोड़ छात्र हर साल स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेते हैं, इसमें से 16 प्रतिशत छात्र इंजीनिरिंग एवं टेक्नोलॉजी पाठ्यक्रमों को चुनते हैं। क्या हम इन दो करोड़ छात्रों को उनकी रुचि के अनुरूप शिक्षा मुहैया करा पाते हैं? सिद्धांतों पर आधारित शिक्षा व्यवस्‍था तो ठीक है, लेकिन मौजूदा प्रतिस्पर्धा के दौर में रोजगार पाने के लिए व्यावहारिक एवं भावात्मक कौशल भी जरूरी है। इसलिए सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक एवं भावात्मक कौशल को भी मूल्यांकन प्रणाली में शामिल किया जाना जरूरी है। नवाचार एवं शोध को बढ़ावा देने के लिए संस्थानों में इन्क्यूबेशन सेंटर्स स्थापित करने की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण है। फैकल्टी को अपडेट रखना भी जरूरी है।

किसी क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं के मूल्यांकन के बाद पाठ्यक्रमों का निर्धारण निम्न से उच्च स्तर पर हो, तो बेरोजगारी की समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। मान लीजिए, कहीं पर कपास की पैदावार होती है, तो ऐसे क्षेत्र की पहचान करके वहां कारपेट एवं टैक्सटाइल स्किल डेवलपमेंट के शिक्षण संस्थान स्थापित करने से स्‍थानीय लोगों को लाभ मिल सकता है।

एशिया में जापान एवं चीन जैसे देशों की अर्थव्यवस्था की मुख्य कड़ी कौशल आधारित शिक्षा ही है। इन देशों में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की एसेम्बलिंग सीखकर छोटे इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का उत्पादन कर लोग आजीविका अर्जित कर रहे हैं। जबकि भारत में छात्रों को व्हाइट कॉलर जॉब के ही सपने दिखाए जाते हैं। कभी भी उसकी रुचि एवं अभिरुचि के बारे में पड़ताल नहीं की जाती। हमें समझना होगा कि एक क्षेत्र श्रम आधारित शिक्षा का भी है, जो व्हाइट कॉलर जॉब तो मुहैया नहीं कराता, लेकिन बेरोजगारी की मार से बचा सकता है। रोजगार के अवसर वाले क्षेत्रों की पहचान कर नए पाठ्यक्रमों का निर्माण भी जरूरी है। इस तरह के प्रयोगों से शिक्षा का महत्व और उसकी उपयोगिता दोनों में वृद्धि होगी।

भारतीय परिदृश्य में इंजीनिरिंग एवं मेडिकल पाठ्यक्रमों की एक बड़ी चुनौती भाषा को लेकर रही है। इंजीनिरिंग एवं मेडिकल पाठ्यक्रमों को क्षेत्रीय भाषा में छात्रों को मुहैया कराने की ओर हमें अग्रसर होना चाहिए, क्योंकि अपनी भाषा में किसी भी पाठ्यक्रम को पढ़ना और समझाना ज्यादा आसान होता है। छात्र पाठ्यक्रम को अपनी भाषा में पढ़ता है, तो विषय के प्रति उसकी रुचि बढ़ेगी। नई शिक्षा नीति में हमें इन पहलुओं का ध्यान जरूर रखना होगा।
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-डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि (लखनऊ) के कुलपति
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