बचपन से ही उनमें आगे चलकर महान दार्शनिक, कूटनीतिज्ञ, महागुरु, महायोगी बनने के लक्षण थे। जो मूरख न समझे, उसे उन्होंने अपने विराट स्वरूप का दर्शन करा दिया- समझाने के लिए कि वे साक्षात भगवान हैं। वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, जिसे आजकल आम आदमी कहते हैं।
बचपन के माखन चोरी वाले प्रसंग ने ही उनके लच्छन उजागर कर दिए थे। किस ठाठ से जी भरकर माखन खाया। अकेले खाने से मन नहीं भरा, तो अपने ग्वाल-बाल को भी प्रेम से खिलाया। और इतना सब करने के बाद मां यशोदा से अकड़ गए! पूछताछ हुई, तो तुनककर बोले, यह ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहि नाच नचायो! चोर ने पलटकर कोतवाल को डांटा, येल्लो जी अपना माल, हमें नहीं चाहिए। और बेचारा कोतवाल हक्का-बक्का रह गया!
कक्षा आठ वाले हमारे हिंदी मास्साब होते, तो वह पूछते, बताओ इन पंक्तिओं से क्या शिक्षा मिलती है? मेरा उत्तर सही होता या नहीं, यह तो स्वर्गीय की आत्मा जाने, पर मैं कहता, महाकवि सूरदास की इन पंक्तियों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पाने के सुख से बड़ा सुख होता है, लौटा देने का, जो माखन से लेकर बड़े-बड़े साहित्यिक पुरस्कारों तक, सब पर लागू हो। मिलने का महान सुख तो होता है, लेकिन मिलने के लिए हर प्रकार के साम, दाम, दंड, भेद वाले हथकंडे आजमाने पड़ते हैं। तब जाकर ‘बड़े भाग मानुस तन पायो’ जैसी सम्मान-पुरस्कार पाने की स्थिति बनती है।
लेकिन जब नए महंत पुराने महंतों की जगह, अपने नए चमचों की फौज साथ लेकर प्रतिष्ठित हो जाए, तो घबराने की जरूरत नहीं। सम्मान के साथ मिला दुशाला घिस चुका। सरकार-प्रदत्त आवासीय प्लॉट मुनाफे में बिक चुका। नकद पुरस्कार कबका उड़ चुका। विदेश यात्राओं, पांच सितारा होटलों का सुख-भोगकर शरीर वापस पंचतत्वों में मिलने की तैयारी में है। आखिरी अवसर है फिर से सुर्खियों में आने का। सम्मान-पुरस्कार का कागज रखकर क्या करना? बोलो, यह ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहि नाच नचायो, और दुबारा सुर्खियों में आ जाओ।