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स्वामिनाथन की सिफारिशें ही रास्ता

Thu, 08 Jun 2017 07:07 PM IST
महक सिंह
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महक सिंह
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आजादी के सत्तर साल बाद जहां एक ओर 'जय जवान और जय किसान' का नारा दिया जा रहा है, दूसरी ओर अपना वाजिब हक मांगने पर मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर गोलियां चलाई गई, जिसमें पांच किसान मारे गए। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान दो जून से आंदोलरत थे। उसके बाद से अब तक महाराष्ट्र में सात आंदोलित किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 
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किसान डॉ स्वामिनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार फसल के लागत मूल्य का डेढ गुना मूल्य दिलवाने, सभी कृषि उपज मंडियों में इस मूल्य से कम पर नहीं खरीदने पर कानून बनाने, कृषि ऋणों की कर्ज माफी करने, सिंचित और बहुफसली भूमि का अधिग्रहण न किए जाने, बढ़े हुए विद्युत बिल वापस लिए जाने आदि की मांग कर रहे हैं। जहां तक डॉ स्वामिनाथन की सिफारिशों को लागू करने की मांग है, तो भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में तथा चुनाव के दौरान स्वयं नरेंद्र मोदी ने अपनी जनसभाओं में इसका वायदा किया था।

परंतु अफसोस की बात है कि मोदी सरकार ने तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर भी इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया। यही नहीं उच्चतम न्यायालय में इस संबंध में योजित एक वाद में सरकार की ओर से अटार्नी जनरल की ओर से एक हलफनामे में कह दिया गया कि डॉ स्वामिनाथन आयोग की सिफारिश लागू करना संभव नहीं है। रिजर्व बैंक भी किसानों की कर्जमाफी के खिलाफ है। 
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अप्रैल माह में तमिलनाडु के किसानों ने भी भयंकर सूखे, कर्जमाफी, फसल के उत्पाद के उचित मूल्य को लेकर जंतर-मंतर पर धरना दिया। महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश के किसान उचित मूल्य न मिलने से अपने उत्पादों को सड़क पर बिखेर रहे हैं, उनमें आग लगा रहे हैं। दूध सड़कों पर बहाया जा रहा है। देश के सबसे बड़े प्याज उत्पादक जिले नासिक में कारोबार ठप हो गया है। महाराष्ट्र के शहरों में प्याज व दूध के दाम दोगुने बढ़ गए हैं। कर्ज के जाल से छटपटा रहे नासिक के प्रत्येक किसान पर लगभग तीन लाख का कर्ज है। क्या सिर्फ आश्वासनों से किसान का पेट भरेगा? किसान को तो एक किलो प्याज के पचास पैसे मिल रहे हैं और उसे उपभोक्ता तीस रुपये किलो तक खरीद रहे हैं। यही हाल आलू का है।

इसी तरह से वर्ष 2017-18 में पेराई सीजन में गन्ने की चार सौ रुपये प्रति क्विंटल की लागत के सापेक्ष मात्र 25 रुपये बढ़ाकर 285 रुपये दर निर्धारित की गई। देश में किसानों के उत्पाद खरीदने के लिए बाजार स्वंतत्र नहीं है। फसल उत्पादों की आवाजाही पर देश में पाबंदी लगा दी जाती है और उन पर आयात पर शुल्क माफ कर दिया जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य केंद्र सरकार तय करती है और इस मूल्य पर खरीदने की जिम्मेदारी भी उसी की है। परंतु केवल छह प्रतिशत किसान ही इसका लाभ उठा रहे हैं और 94 प्रतिशत किसान बाजार पर निर्भर रह कर बिचौलियों द्वारा लूटे जाते हैं। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की फसलों की न्यूनतम मूल्य निर्धारित करने की पद्धति आधारहीन एवं काल्पनिक है। केंद्र सरकार कॉरपोरेट जगत को संकट से उबारने के लिए 4.50 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज दे सकती है, परंतु किसानों की कर्जमाफी और लाभकारी समर्थन मूल्य पर हाहाकार मच जाता है।  

आश्चर्य तो यह है कि नोटबंदी के कारण जब जीडीपी के अंकड़ों में कमी आई है, तब भी कृषि का प्रदर्शन जीडीपी के आंकड़ों को और अधिक गिरने से रोकने में कामयाब रहा। फिर भी किसानों के खिलाफ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है? सरकार को चाहिए कि वह स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू करे।
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