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स्वामी अग्निवेश के हमलावर

तवलीन सिंह Updated Sun, 22 Jul 2018 06:32 PM IST
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तवलीन सिंह

कभी-कभी ऐसा होता है। दरअसल हम अपने देशवासियों के बारे में इतना कम जानते हैं कि उनकी असलियत तभी सामने आती है, जब कोई ऐसी घटना घटती है, जिसके घटने से उसका यथार्थ सामने आता है। ऐसा मेरे साथ पिछले सप्ताह हुआ, जब मैंने स्वामी अग्निवेश पर किए गए हमले के बाद उनकी तस्वीरें ट्विटर पर देखीं। मैं जानती हूं कि पिछले चार वर्षों में इस किस्म के हिंदुत्ववादी हमलावरों ने गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों पर हमले किए हैं। लेकिन इन हिंदुत्ववादियों ने एक संन्यासी पर शायद पहली बार ऐसा हमला किया है।



स्वामी जी न सिर्फ संन्यासी हैं, बल्कि उनकी गिनती महान कर्मयोगियों में होती है। मैं उनको पिछले चालीस साल से जानती हूं। पहली बार हम तब मिले थे, जब स्वामी जी बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने का काम किया करते थे। उनके साथ एक बार मैं झारखंड के पलामू जिले के गांवों के दौरे पर गई थी। तब डाल्टगंज से दस किलोमीटर की दूरी पर हमें ऐसे बंधुआ मजदूर मिले, जिन्होंने कभी पैसा नहीं देखा था। पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ होने के नाते उनको उनके मालिक अपनी जमीनों के दायरे से बाहर कदम नहीं रखने देते थे, सो वे गुलाम लोग इतना भी नहीं जानते थे कि उनके गांव के पास कौन-सा शहर था, वे किस राज्य में रहते थे। स्वामी जी ने ठान लिया था कि इस अत्याचार को रोकना ही है, सो बंधुआ मजदूरी रोकने के इस आंदोलन के लिए अपना जीवन वह समर्पित कर चुके थे।


इसके बाद मैं उनके साथ उन बच्चों को रिहा कराने जाया करती थी, जिनको दलालों ने उनके माता-पिता की गरीबी का लाभ उठाकर मुंबई और दिल्ली के कारखानों में बेच रखा था। वे बच्चे भी बंधुआ मजदूर थे। दिन-रात की मेहनत के बाद उनको घर भेजने के लिए दस रुपये जमा करने का भी अवसर नहीं मिलता था। ऐसे बच्चों के लिए स्वामी अग्निवेश ने इतना काम किया है कि मेरा अपना मानना है कि नोबेल पुरस्कार इन्हें मिलना चाहिए था।


सो सोचिए कि स्वामी अग्निवेश जैसे व्यक्ति पर इतना बर्बर हमला करने वाले कैसे लोग रहे होंगे। स्वामी जी की पगड़ी उतार दी गई और उनके भगवा कपड़े फाड़ दिए गए। इन तस्वीरों को देखकर मेरे दोस्त शेखर गुप्ता ने ट्वीट किया कि चालीस साल स्वामी जी को अच्छी तरह जानने के बाद पहली बार उन्होंने स्वामीजी को बिना पगड़ी के देखा था। मेरी भावना भी यही है और मैं शर्मिंदा हूं कि मेरे देश में स्वामी जी जैसे व्यक्ति पर हमला हो सकता है।


उन पर हमला करने वालों ने उन पर यह आरोप लगाया कि वह हिंदुओं के विरोधी हैं। हमले के बाद उन्होंने यह बात सोशल मीडिया पर कई बार कही और उस भाषण का वीडियो दिखाया, जिसको वे सुबूत मानते हैं। इस भाषण में स्वामी जी सनातन धर्म के विरोध में बातें नहीं कर रहे, लेकिन अंधविश्वास की कड़ी निंदा जरूर कर रहे हैं।

 

आर्य समाजी होने के नाते अंधविश्वास का विरोध करना उनका धर्म है, लेकिन आज के भारत में हिंदुत्ववादियों ने द्वेष का जहर फैलाकर ऐसा वातावरण बना रखा है कि इतना भी कहना अब हिंदू धर्म का विरोध माना जाता है।


यह सनातन धर्म की परंपरा नहीं है। सनातन धर्म की परंपरा तो चार्वाक को भी ऋषि मानने की है, सो यह सवाल पूछना गलत नहीं होगा कि आज के हिंदुत्ववादी कहीं जेहादी कट्टरपंथियों से तो प्रेरणा नहीं ले रहे? इस्लामी देशों में जो जेहदी हिंसा फैल चुकी है, क्या भारत में उसी का हिंदू रूप देखने को मिल रहा है?

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