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ईरान को दबाना समाधान नहीं

Wed, 27 Nov 2013 07:57 PM IST
रोजर कोहन/पत्रकार, लेखक
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एक-दूसरे को आघात पहुंचाने का दौर समाप्त हो चुका है। अमेरिका और ईरान ने अपने रिश्ते को अब एक नया मोड़ दिया है। दोनों देशों के बीच हो रहीं द्विपक्षीय वार्ताएं, बेहतर माहौल में हो रही मुलाकातें और महत्वपूर्ण समझौते इसी का प्रमाण हैं। पारस्परिक स्वीकृति से निर्धारित ईरान के यूरेनियम संवर्द्धन कार्यक्रम पर अमेरिका की रजामंदी और बदले में किसी भी हालत में परमाणु हथियार विकसित न करने के ईरान के वायदे ने दोनों देशों के बीच के तनाव को कम करने का काम किया है।
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वैश्विक शक्तियों और ईरान के बीच हुए छह महीने के अंतरिम समझौते की अवधि को छह माह तक और बढ़ाया जा सकता है। हालांकि अभी इसे अंतिम आकार मिलना बाकी है। इससे ईरान के तकनीक संवर्द्धन कार्यक्रम पर रोक लगेगी। दरअसल यह समझौता ईरान समस्या के सैन्य समाधान का विकल्प साबित होगा। इससे अमेरिका और ईरान के संबंधों में तेजी आएगी और मध्य एशिया की रणनीतिक तस्वीर को नया आयाम देने में भी मदद मिलेगी।

दूसरी ओर इस्राइल इस समझौते के खिलाफ है। उसका मानना है कि यह पूरे मध्य एशियाई क्षेत्र के लिए खतरनाक साबित होगा। दरअसल इस्राइल यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में है, क्योंकि इससे पूरे क्षेत्र में परमाणु हथियारों को लेकर उसका दबदबा बना रहेगा। यही वजह है कि तानाशाही के खिलाफ अरब में हुए विद्रोह सहित इस क्षेत्र में होने वाली किसी भी हलचल को वह संदेह की नजर से देखता है। पर बदलाव तो स्वाभाविक होते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता बहुत बड़ी घटना है, उतनी ही बड़ी, जितनी कि इस्राइल और फलस्तीन के बीच शांति वार्ता।
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सर्वशक्तिमान अमेरिका समय के साथ अपनी नीतियों में जिस तरह बदलाव ले आया, उससे इस्राइल को सीख लेनी चाहिए। इस यहूदी राज्य को समझना होगा कि किसी राष्ट्र की मजबूती को कायम रखने के लिए 'प्रभुत्व' के बजाय 'एकीकरण' की नीति ज्यादा जरूरी होती है। जबकि वर्तमान हालात में इस्राइल की सोच इसके ठीक विपरीत है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस समझौते के जरिये जो एक नया पैमाना तय किया है, उससे इस्राइल भी रणनीतिक तौर पर प्रभावित होगा। इस समझौते से अलग-थलग पड़ने की आशंका से चौकन्ना इस्राइल ईरान पर सैन्य हमला नहीं करने जा रहा है।

यह बिल्कुल साफ है कि मौजूदा स्थिति में इससे बेहतर समझौता नहीं हो सकता था। ताकत का इस्तेमाल, यहां तक कि इस्राइल की लगातार बमबारी भी, ईरान को परमाणविक रास्ते से नहीं डिगा सकती थी। जबकि मौजूदा समझौते के जरिये ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाया जा सकेगा। इस समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कुछ तकनीक बाध्यताएं लागू करने के साथ ही सक्रिय अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षण की भी व्यवस्था की गई है। बदले में ईरान को अपने ऊपर लगे हुए प्रतिबंधों में छह से सात अरब डॉलर की राहत मिलेगी। अब तक अलग-थलग पड़े ईरान के लिए यह एक नई शुरुआत है।

सिर्फ पश्चिम ही नहीं, ईरान के ज्यादातर युवा भी ईरान को शेष विश्व से जुड़े हुए देखना चाहते हैं। इनका मानना है कि संपर्क से सौहार्द, और अलग-थलग रहने से अतिवाद को बढ़ावा मिलता है। ओबामा खुद मानते हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से पैदा हुई चुनौतियों का स्थायी समाधान कूटनीति के जरिये ही संभव है।

ईरान के मुद्दे पर अमेरिका और इस्राइल के बीच के मतभेद केवल रणनीतिक ही नहीं हैं। दरअसल अमेरिका ने समझा कि ईरान को एक सीमा तक यूरेनियम संवर्द्धन की अनुमति देने का समझौता ही स्थायी हो सकता है। लिहाजा दीर्घस्थायी समझौते की श्रेणी में आने वाले इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को उन गैर परमाणुशक्तिसंपन्न देशों के परमाणु कार्यक्रम की तरह देखा जाएगा, जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत किए हैं।

जापान और जर्मनी भी इन देशों में आते हैं, जिन्होंने अपने सक्रिय परमाणु संवर्द्धन कार्यक्रम के बावजूद एनपीटी पर हस्ताक्षर किए हैं। जबकि इस्राइल का कहना था कि ईरान को यूरेनियम संवर्द्धन की अनुमति न दी जाए और उसके परमाणु कार्यक्रम पर लीबिया की तरह पूर्ण प्रतिबंध लगे।

दूसरी ओर अमेरिका अब तक सामुदायिक बेदखली का सामना कर रहे ईरान की बराबरी के अधिकार के साथ वापसी के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि ईरान की ओर से संदिग्ध गतिविधियों और उकसाऊ बयानों की आशंकाएं हमेशा की तरह बनी रहेंगी, पर ईरान की पुनर्वापसी के लिए अमेरिका पूरी तरह कमर कस चुका है। जबकि बेंजामिन नेतन्याहू का इरादा कुछ और ही है। वह ईरान को हमेशा दबाकर रखने के पक्षधर हैं। स्टेनफोर्ड और हार्वर्ड विश्वविद्यालयों में पढ़े ईरान के एक व्यापारी कहते हैं कि तेहरान की जिद और इस्राइल की हरकतों के बावजूद ईरानी लोग बखूबी समझते हैं कि शेष विश्व से उनकी निकटता बहुत जरूरी है।

कूटनीति में समझौते करने पड़ते हैं और जोखिम भी उठाना पड़ता है। यह समझौता ईरान के लिए भी परीक्षा साबित होने वाली है। हालांकि नतीजे के बारे में कहना जल्दबाजी होगी, फिर भी विश्व इसे उम्मीद की नजर से देख रहा है। शायद यही नेतन्याहू को अखर रहा है। वह अपने प्रतिपक्षी को दबा कर रहने के पक्ष में रहे हैं। मगर जैसा कि वक्त की मांग है और ओबामा और केरी भी सलाह दे रहे हैं कि नेतन्याहू को गंभीरतापूर्वक फिर से विचार करना ही चाहिए।
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