महिलाओं के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि देश की आजादी के सत्तर साल बाद भी उनके बुनियादी अधिकारों के लिए न्यायालय को दखल देना पड़ता है! शादीशुदा नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखने का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला कुछ ऐसा ही है। बाल विवाह के उपरांत गुलामों जैसा जीवन जीने को मजबूर लड़कियों के लिए यह फैसला राहत देने वाला है। सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि बलात्कार संबंधी कानून में मौजूद अपवाद महिलाओं के अधिकारों से जुड़े दूसरे कानूनों के सिद्धांतों के प्रति विरोधाभासी हैं और यह नाबालिग लड़कियों के अपने शरीर पर संपूर्ण अधिकार और उसके स्व-निर्णय के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने केंद्र और राज्यों की सरकारों से कहा है कि वे बाल विवाह रोकने की दिशा में सक्रिय कदम उठाएं।
दरअसल इस मामले में अब तक तीन अलग-अलग कानूनों के बीच विसंगतियां बरकरार थीं, जिस पर स्पष्टता जरूरी थी। चार साल पहले गठित जस्टिस जेएस वर्मा समिति की रिपोर्ट में बलात्कार और यौन शोषण से जुड़े कानूनों को बेहतर बनाने की जरूरत पर बल दिया गया था। उस समय समिति ने अपनी सिफारिशों में विभिन्न महिला संगठनों की राय को काफी महत्व दिया था, पर सरकार ने उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं दी। महिला संगठनों का मानना था कि नाबालिग लड़की के साथ संबंधों को दोबारा परिभाषित करने की जरूरत है। इसे सरकार की असंवेदनशीलता ही कहेंगे कि उसने न तो उस वक्त कोई पहल की और न ही ताजा मामले में परंपरा के बहाने होने वाली इस सामाजिक बुराई का विरोध करने की हिम्मत दिखाई। दोनों मौकों पर केंद्र में दो अलग-अलग पार्टियों की सरकारें रहीं, लेकिन उनकी मौलिक सोच में कोई अंतर नहीं दिखा। अदालत में केंद्र ने दलील दी कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, इसलिए संसद इसे सरंक्षण दे रही है। यह हास्यापद ही है कि परंपराओं की दलील वही सरकार दे रही है, जिसने कुछ समय पहले मुस्लिम धर्म में व्याप्त तीन तलाक की गलत परंपरा खत्म करने के लिए अदालत में पूरा जोर लगा दिया था।
अधिकार और सामाजिक बुराइयों को धर्म के चश्मे से देखने वाले राजनेताओं को धर्मगुरुओं का भी सर्मथन मिलता है। बाल विवाह को कई मुस्लिम धर्मगुरु न्यायसंगत बताते हैं और वे इस फैसले को इस्लाम के लिए खतरा करार देते हैं। पर मेरे मुस्लिम दोस्तों की जानकारी में कुरान में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है। उसी प्रकार कई हिंदू समाज में यह मान्यता है कि बालिका की माहवारी आने से पहले यदि उसका कन्यादान कर दिया जाए, तो पुण्य मिलता है। ये सारी बातें उसी पुरुषवादी समाज की महिला-विरोधी सोच का नतीजा है, जिसके दायरे में समाज में कभी सती प्रथा जैसी अमानवीय परंपराएं भी व्याप्त थीं।
इस तरह के ऐतिहासिक निर्णयों के मुख्यतः दो तरह के परिणाम देखने को मिलते हैं। पहला यह कि तत्काल प्रभाव से अब कोई भी लड़की इस फैसले के सहारे अपने अधिकारों के लिए कानूनी संरक्षण प्राप्त कर सकती है। पति की शारीरिक हिंसा का शिकार होने वाली कम उम्र की लड़कियां विरोध कर पाएंगी। कई पीड़ित लड़कियां न्याय के लिए सामने आएंगी। अमूनन अब तक ऐसे मामलों को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती थी। कानूनी उलझन के कारण मीडिया में भी इस अपराध की बहुत ज्यादा चर्चा नहीं होती थी। दूसरी बड़ी बात यह कि इससे एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की नींव रखी जा सकती है। गांव या उन पिछड़े इलाकों में, जहां यह समस्या ज्यादा है, वहां लोगों के बीच इस फैसले को लेकर जागरूकता फैलाने की जरूरत होगी। हमें इसके परिणामों के लिए धैर्य की भी आवश्यकता होगी। कोई भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन तत्काल नहीं आ सकता। न्यायालय के इस फैसले के दूरगामी नतीजे होंगे। पूरी उम्मीद है कि इसका असर वैवाहिक बलात्कार की बहस पर भी पड़ेगा, जो महिलाओं के अधिकारों से जुड़े इस अहम मसले का विस्तार है। हालांकि इस मामले की ही तरह वैवाहिक बलात्कार के पक्ष में भी सरकार की अपनी दलीले हैं। पिछले दिनों एक बड़े नेता ने वैवाहिक बलात्कार के विरोध में यह बयान दिया था कि यदि ऐसा कानून बना, तो अधिकतर पति जेल में होंगे। उनके इस बयान का दूसरा पहलू यही है कि अधिकतर पति अपनी पत्नी के साथ जोर-जबरदस्ती से संबंध बनाते हैं।
कम उम्र में शादी का मुख्य कारण अशिक्षा और गरीबी है। मां-बाप गरीबी के कारण अपनी बेटी का जल्दी विवाह कर एक सामाजिक दायित्व से निवृत्त होना चाहते हैं। अशिक्षित होने और जागरूकता के अभाव के कारण उन्हें यह मालूम ही नहीं होता है कि वे अपनी बेटी को एक ऐसी मानवीय त्रासदी की ओर धकेल रहे हैं, जिससे वह जिंदगी भर नहीं निकल पाएगी। बाल विवाह के कारण लड़की को गंभीर मानसिक व शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत बाल विवाह के मामले में दूसरे स्थान पर है। आंकड़े बताते हैं कि देश में करीब 43 फीसदी लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है। वहीं इसमें भी एक बड़ा हिस्सा उन लड़कियों का है, जिनकी शादी पंद्रह साल से कम उम्र में हो जाती है। इन आंकड़ों से ही इस फैसले की महत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाल विवाह रोकने के लिए इसकी कितनी जरूरत थी। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में आज भी आखातीज (अक्षय तृतीया) के मौके पर बाल विवाह की परंपरा निभाई जाती है।
इसे राजनेताओं की उदासीनता ही कहेंगे कि अब तक किसी भी बड़े राजनेता ने इस फैसले का खुले मन से स्वागत नहीं किया है। उनके लिए यह मुद्दा जनता से वोट लेने वाला प्रतीत नहीं होता, जैसा कि तीन तलाक के मुद्दे पर देखने को मिला था। फिर भी उम्मीद की जा सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद देर से ही सही, पर समाज में बदलाव देखने को मिलेगा।