उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विगत 17 अप्रैल को कहा था कि द्रौपदी के चीरहरण के वक्त वहां मौजूद लोग मौन थे और अब बहुत से लोग तीन तलाक के मुद्दे पर मौन हैं। जो लोग मौन हैं, वे अपराधी हैं। उन्होंने बताया भी कि द्रौपदी के अपमान के मूक दर्शक कौन-कौन थे-उनको जुए में हारने वाले उनके पति, उनके अन्य वीर पति, हस्तिनापुर के राजगुरु, कुरुवंश के पितामह और तमाम राजा-महाराजा। इन सबको योगी जी ने कठघरे में उन लोगों के साथ खड़ा कर दिया, जो मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय को सही ठहराते हैं या उसे अनदेखा कर देते हैं।
महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय, हर धार्मिक समुदाय के अंतर्गत उनकी गैरबराबरी और सत्ताधारियों की ओर से उनकी पीड़ा और दर्द के प्रति संवेदनहीनता महिला आंदोलन के निशाने पर हमेशा से हैं। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने बीती सदी के आठवें दशक में ‘समान कानून, समान अधिकार’ के नाम से तमाम समुदायों की महिलाओं का बड़ा सम्मलेन किया था, जिसमे हर समुदाय के पर्सनल लॉ (जिसमे हिंदू महिलाओं को प्रभावित करने वाले कानून भी शामिल थे) के बारे में गहन अध्ययन पर आधारित लेख प्रस्तुत किए गए थे और उन पर गहन चर्चा हुई थी। सम्मेलन में यह मांग भी की गई थी कि हर समुदाय की महिला को उस समुदाय के पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाएं। इसके साथ हर नागरिक को, चाहे वह महिला हो या पुरुष, समानता का अधिकार प्राप्त हो। इसके लिए पर्सनल लॉ में सुधार के अतिरिक्त तमाम कानूनों में सुधार आवश्यक है। अगर मुस्लिम महिलाएं एकतरफा तीन तलाक, बहुविवाह और हलाला से परेशान हैं, तो हिंदू महिलाएं भी दहेज, बाल विवाह, अवैध बहुविवाह और विरासत पाने में असमानता की शिकार हैं। ईसाई महिलाओं को भी शादी, तलाक और विरासत के अधिकार पाने में कई तरह की कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ता है। कुछ आदिवासी समूह भी हैं, जो बहुविवाह की अनुमति देते हैं। इसके साथ बलात्कार और हिंसा के कानून को शक्तिशाली बनाने, घरेलू हिंसा और इज्जत के नाम पर हो रहे अपराध के खिलाफ मजबूत कानून बनाने की लड़ाई भी चल रही है।
योगी जी का बयान एक बड़ी सच्चाई की तरफ ध्यान खींचता है। उन्होंने तीन तलाक के समर्थकों की तुलना उन लोगों से की है, जिन्हें हमारे सामने आदर्श के रूप में पेश किया जाता है। ऐसा करके उन्होंने हमें इन पर नए दृष्टिकोण से पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। वह दृष्टिकोण महिलाओं के प्रति उनकी सोच से संबंधित है। महिलाओं के प्रति उनका क्या रवैया था; उनके साथ होने वाले उत्पीड़न और हिंसा में उनकी अपनी भागीदारी कितनी थी; पुरुष प्रधानता को मजबूत करने और महिलाओं को दूसरे दर्जे का प्राणी बनाने में उनका कितना योगदान था, आदि-आदि। इन महापुरुषों के अनेक गुण भी रहे होंगे, पर महिलाओं के प्रति उनकी सोच और उनका व्यवहार दोषपूर्ण ही नहीं, बल्कि अपराध भरा था।
महिला आंदोलन धर्म और जाति के आधार पर महिलाओं की गैरबराबरी को नहीं देखता। उसका मानना है कि पुरुष प्रधानता के चलते हर समुदाय में महिला के साथ अन्याय और जुल्म होता है। वह तमाम महिलाओं के हकों की लड़ाई लड़ता है और इस मुद्दे के सांप्रदायीकरण का विरोध करता है। सांप्रदायीकरण से महिलाओं के न्याय की लड़ाई कमजोर पड़ती है तथा पुरुष प्रधानता को और बल मिलता है।