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योग्यता और कर्मठता का पुरस्कार

Fri, 05 Jul 2013 09:32 PM IST
हेमेन्द्र मिश्र
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भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों में यह आम धारणा रही है कि बतौर राजनयिक आपकी क्षमता का वास्तविक मूल्यांकन तभी होगा, जब चीन या पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में आपकी नियुक्ति होगी। लेकिन आगामी एक अगस्त को विदेश सचिव का पदभार संभालने जा रही सुजाता सिंह यह धारणा खंडित करती दिख रही हैं। राजनयिकों का शीर्ष पद संभालने जा रही इस महिला ने बतौर राजनयिक न चीन में काम किया है, न पाकिस्तान में। 29वां विदेश सचिव बनने जा रहीं सुजाता सिंह चोकिला अय्यर और निरुपमा राव के बाद तीसरी महिला होंगी।
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आखिर क्या वजह है कि आम तौर पर पश्चिमी देशों में राजनयिक रहीं सुजाता सिंह मनमोहन सरकार की पहली पसंद बनकर उभरीं? उनके आलोचक इसकी जड़ उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में तलाशते हैं। गौरतलब है कि गांधी परिवार के करीबी उनके पिता टीवी राजेश्वर आईबी के पूर्व प्रमुख हैं और उत्तर प्रदेश, सिक्किम और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रह चुके हैं। लेकिन सुजाता सिंह के सहयोगी और उनके साथ काम कर चुके अधिकारी इससे इत्तफाक नहीं रखते।

उन्हें तेज-तर्रार 'बॉस' के साथ ही समझौता न करने वाला शख्स बताया जाता है, जो घंटों वाद-विवाद के बाद भी अपने तर्कों को प्रभावी तरीके से रखने में सक्षम है। ऑस्ट्रेलिया की यूरेनियम बिक्री की नीति बदलवाकर उसे भारत के हक में करने तथा भारतीय छात्रों के साथ हो रही नस्लीय हिंसा के दौरान ऑस्ट्रेलियाई सरकार पर दबाव बनाने में सुजाता सिंह की अहम भूमिका को आज भी शिद्दत से याद किया जाता है।
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पर नई दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स की यह पूर्व छात्रा उपलब्धि के इस शीर्ष तक पहुंची हैं, तो इसकी और भी वजहें हैं। उन्हें आज भी अपने कार्यालय में देर शाम तक काम करने के लिए 'कुख्यात' माना जाता है। इस कारण विदेश सेवा के ही सेवानिवृत्त अधिकारी उनके पति संजय सिंह यह ताना देने से भी नहीं चूकते कि सुजाता की शादी उनसे नहीं, अपने काम से हुई है।

जर्मन भाषा में निष्णात सुजाता की नई चुनौती अब उन देशों से संबंध सामान्य बनाने की होगी, जहां उन्होंने काम नहीं किया है। चीन और पाकिस्तान में अपने हित साधने के साथ ही ऊर्जा संकट से निपटने के लिए पश्चिम मुल्कों से बेहतर समझौते करने में भी उनकी क्षमता का 'आकलन' होगा, जिसमें आर्थिक ज्ञान उनके काम आ सकता है।
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