उत्तराखंड की त्रासदी से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश से विजय गुप्ता ने बातचीत की।
-उत्तराखंड में हुई तबाही के लिए कौन जिम्मेदार है?
उत्तराखंड में हुई तबाही एक प्राकृतिक आपदा है। इसके पीछे के कारणों का पता लगाया जा रहा है। इसके लिए अभी किसी को दोषी ठहराना ठीक नहीं है, क्योंकि आपदा के जो कारण हैं, वे एक दिन में नहीं बने हैं। अभी सवाल यह नहीं है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है, उसकी शिनाख्त हो, बल्कि जरूरत है वहां राहत व बचाव कार्यों को तेज करने की, ताकि जानमाल की और क्षति होने से रोका जा सके।
-पर्यावरण मंत्री रहते हुए आपने वहां गोमुख से उत्तरकाशी तक 135 किलोमीटर क्षेत्र को पर्यावरण संवेनशील क्षेत्र बनाने की पहल की थी। लेकिन अभी तक यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है, जबकि उत्तराखंड में अब आपकी सरकार है।
सरकार किसी की भी हो, विकास के नाम पर पर्यावरण का विनाश करने की इजाजत किसी को नहीं है। विकास आज की जरूरत है, पर यह भी जरूरी है कि उससे पर्यावरण को ज्यादा नुकसान न हो। वर्तमान में उत्तराखंड सरकार भी इस मुद्दे पर गंभीर है। राज्य में नदियों के आसपास निर्माण कार्यों पर रोक लगी हुई है।
-निर्माण कार्यों पर रोक लगी होती, तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी न होती। पर्यावरणविद जल प्रलय के लिए जगह-जगह बनाए जा रहे बांध को कारण बता रहे हैं। जबकि राज्य सरकार इसे सही नहीं मानती। वह ऊर्जा जरूरतों की दुहाई दे रही है।
अभी यह कहना जल्दबाजी है कि जल प्रलय के लिए वहां बनाए गए बांध जिम्मेदार हैं, क्योंकि यह बात भी सामने आई है कि यदि टिहरी बांध न होता, तो तबाही और भयावह हो सकती थी। इसलिए जरूरी है कि ऊर्जा उत्पादन के लिए जो भी निर्णय लिए जाएं, वे पर्यावरण संतुलन को सामने रखकर लिए जाएं।
-पर्यावरणविद इसे प्राकृतिक आपदा से ज्यादा मानव जनित आपदा बता रहे हैं। आप कहां तक सहमत हैं?
अभी कौन क्या कह रहा है, सरकार इस पर ध्यान देने के बजाय पूरी ताकत प्रभावितों को बचाने और उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में लगा रही है। मामला गंभीर है, इसलिए इस पर बाद में गंभीरता से विचार किया जाएगा कि इस आपदा की असली वजह क्या है। भविष्य में इस तरह की घटना न हो, इसके लिए पुख्ता इंतजाम किए जाएं।
-दुर्गम पहाड़ी इलाकों में महत्वपूर्ण तीर्थस्थल होने के बावजूद अभी तक सरकार ने ऐसा ढांचा विकसित क्यों नहीं किया, जिससे वहां आने-जाने वालों को नियंत्रित किया जा सके? जबकि अन्य तीर्थस्थलों में ऐसी व्यवस्था है।
यह ठीक है कि वैष्णो देवी और अमरनाथ में इस तरह की व्यवस्था लागू है। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में भी तीर्थयात्रियों का लेखा-जोखा रखा जाता है। लेकिन बात आस्था की है। इसलिए सरकार इसे एक हद तक ही नियंत्रित कर सकती है। फिर भी केदारनाथ में तीर्थयात्रियों की संख्या जिस तरह बढ़ रही है, उसे देखते हुए भीड़ को नियंत्रित करना जरूरी हो गया है।
-तबाही के बाद उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर ढांचागत विकास की जरूरत है। ग्रामीण विकास मंत्रालय राज्य के पुनर्निर्माण में किस तरह योगदान करने जा रहा है?
ग्रामीण विकास मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष के बजट में उत्तराखंड के लिए जो बजट निर्धारित किया था, उसमें सौ फीसदी की और बढ़ोतरी कर दी है। इंदिरा आवास योजना, मनरेगा और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के जरिये राज्य में पुनर्निर्माण कार्यो को तेज करने को मंजूरी दी गई है। राज्य में 700 किलोमीटर लंबी सड़क और 14,000 मकानों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है।