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सपने का मौत में बदल जाना

Mon, 10 Jun 2013 09:02 PM IST
गौतम कौल
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आप शोले फिल्म का यह संवाद शायद ही भूले होंगे, जब अंग्रेज लोग मरते हैं... उसे 'सुसाइड' कहते हैं! हमें लगातार यह याद दिलाया जा रहा है कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के 'अंग्रेज लोग' समय से पहले अपने जीवन का अंत कर लेते हैं और लगभग ऐसे सभी मामलों में शामिल 'बाबा लोग' समृद्ध परिवारों से आते हैं।
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ताजा मामला जिया खान की खुदकुशी का है। जिया खान ने 2006 में फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया था। रामगोपाल वर्मा द्वारा निर्देशित फिल्म निःशब्द में अमिताभ बच्चन जैसे शीर्षस्थ कलाकार के साथ काम करने का उन्हें मौका मिला। यदि आप शीर्ष से शुरुआत करते हैं, तो उसके बाद केवल फिसल ही सकते हैं।

और जिया खान के साथ यही हुआ। उन्होंने गजनी फिल्म में आमिर खान के साथ काम किया। उस फिल्म में जिया खान की भूमिका सार्थक थी, लेकिन यही उनके करियर के लिए पर्याप्त नहीं था। मगर मेरा यह लेख जिया खान पर नहीं, बल्कि प्रदर्शनकारी कला जगत में युवाओं की खुदकुशी की समस्या पर है।
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इस समस्या की तरफ मेरा ध्यान तभी गया था, जब युवा अभिनेत्री दिव्या भारती ने अपने घर पर चल रही पार्टी के दौरान बालकनी से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। सभी समझते थे कि उसने इतनी ज्यादा पी ली थी कि होश नहीं रहा, पर बाद में उनकी खुदकुशी के कारण का पता चला।

वजह थी, इंडस्ट्री के एक उदीयमान पुरुष कलाकार के साथ उनका भावनात्मक संबंध। उसके बाद से हर वर्ष फिल्म इंडस्ट्री के कलाकारों, प्रमुख रूप से महिला कलाकारों द्वारा खुदकुशी करने या खुदकुशी की कोशिश करने की एक के बाद एक खबरें हम पढ़ते आ रहे हैं।

जब भी इस तरह की घटना होती है, तो फिल्म इंडस्ट्री के लोग सहानुभूति जताते हैं और फिर काम में मशगूल हो जाते हैं। दिवंगत कलाकार की जगह भरने के लिए दूसरा कलाकार आ जाता है। असल में किसी को इसकी फिक्र नहीं होती कि आप जिंदा हैं या मर गए, क्योंकि आपकी जगह लेने के लिए दूसरा तैयार रहता है।

सवाल है कि ये आत्महत्याएं क्यों होती हैं? फिल्म इंडस्ट्री में प्रति दस हजार व्यक्तियों में आत्महत्या करने वालों का अनुपात राष्ट्रीय आंकड़ों के मुकाबले ज्यादा है। जाहिर है, फिल्म इंडस्ट्री आदमखोर बन गई है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, मन मुताबिक काम नहीं मिल पाने की हताशा आत्महत्या का कारण बनती है।

जिया खान हताशा के चरम पर थी। युवक-युवतियां रातोंरात 'स्टार' बनने की उम्मीद में फिल्म इंडस्ट्री की तरफ आकर्षित होते हैं। कभी-कभी कुछ लोगों के सपने साकार हो जाते हैं, जिससे और भी ज्यादा लोग यहां आने के लिए प्रेरित होते हैं।

फिल्म इंडस्ट्री की ओर आने वाले इस प्रवाह को रोकने का कोई उपाय नहीं है। मुंबई पुलिस ने तो रेलवे स्टेशनों पर पुलिस के छोटे दस्ते भी तैनात कर रखे हैं, ताकि फिल्म इंड्रस्ट्री में करियर की उम्मीद में घर से भागकर आए लड़के-लड़कियों पर नजर रखी जा सके। ऐसे युवा अक्सर लूट का शिकार हो जाते हैं या फिर उनका सफर चकलाघरों में खत्म होता है।

आत्महत्या का दूसरा कारण व्यक्ति की अति संवेदनशीलता और उसका मिजाज भी है। ऐसे लोगों को हम कभी-कभार दोहरे व्यक्तित्व के शिकार के रूप में जानते हैं। जिया खान भी कुछ हद तक इससे ग्रस्त थीं। ऐसे लोग दूसरों पर अत्यधिक हक जताते हैं और इनकार सुनना नहीं चाहते।

जब उसके अधिकार का विरोध किया जाता है, तो पीड़ित को लगता है कि उसे अस्वीकार्य किया जा रहा है और वह आसन्न एकाकीपन के भय से आत्महत्या कर लेता है। जिया खान के छह पेज में लिखे सुसाइड नोट से संकेत मिलता है कि उन्हें अपने पुरुष मित्र के छोड़ देने का भय सता रहा था।

1940 के बाद के युग में जब फिल्म इंडस्ट्री बड़े स्टूडियों द्वारा संचालित होती थी, फिल्म कलाकारों को लंबे समय तक वेतनभोगी के रूप में नियुक्त किया जाता था।

स्टूडियो मालिक सभी कलाकारों की देखभाल की व्यवस्था करते थे। जब वे युवा लड़के-लड़कियां पार्टी के लिए बाहर जाते थे, तो उनके साथ गार्ड होते थे। उनके स्वास्थ्य की देखभाल सर्वोपरि थी और उनके सोने एवं घूमने के समय पर नियंत्रण होता था।

फिर इनमें ढिलाई की शुरुआत हुई। आखिरकार चंद्र मोहन एवं अशोक कुमार जैसे कलाकारों ने ऐसे युवा कलाकारों को बॉन्ड एवं अनुबंध के दायरे बाहर निकाला, पर जल्दी ही वे फिल्म इंडस्ट्री के भूखे भेड़ियों के हवाले हो गए।

स्टारडम की शुरुआती सफलता और अचानक मिली इस सफलता को संभाल नहीं पाना भी आत्महत्या का एक अन्य कारक है। इस सफलता के साथ काम का तनाव एवं चिंताएं भी जुड़ी होती हैं, जो व्यक्ति को अल्कोहल एवं ड्रग लेने के लिए प्रेरित करती है।

दिव्या भारती को वह सब कुछ मिला, जो कोई चाह सकता है, पर वह भारी मात्रा में शराब पीती थी। आत्महत्या के समय भी वह नशे में थी।

काम का तनाव वैसे सफल व्यक्तियों को भी प्रभावित करता है, जो एक दिन में चार पारियों में काम करते हैं। एक समय के बाद वे भारी थकान एवं तनाव से पस्त हो जाते हैं। वे बुरे वक्त की चुनौतियों को झेलने के लिए तैयार नहीं होते और खुदकुशी की कोशिश करते हैं।

मुझे लगता है कि फिल्म निर्माताओं को अब अपने साथ सामाजिक सलाहकारों को जोड़ना चाहिए, जो कंपनी और युवा कलाकारों के बीच एक कड़ी की भूमिका अदा कर सके।

इसके अलावा फिल्म प्रोमोटर एवं पीआरओ को भी युवा कलाकारों के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाली कहानियां गढ़ने से बाज आना चाहिए। कर्तव्य वरिष्ठ कलाकारों का भी है िक वे जूनियर कलाकारों की अनदेखी से बचें और जब उन्हें लगे कि हालात खराब हो रहे हैं, तो बतौर अभिभावक युवा कलाकारों को सलाह दें।
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