हाल ही में लंदन के सुविधा-संपन्न ग्रोव होटल में दुनिया भर के करीब सौ धनी एवं प्रभावशाली लोगों की 61वीं गुप्त वार्षिक बैठक हुई, जिसमें पहली बार प्रेस को जानकारी देने की व्यवस्था की।
इन प्रभावशाली लोगों के समूह को बिल्डरबर्ग समूह कहा जाता है, जिसका गठन शीतयुद्ध के दौरान यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका के बीच आर्थिक एवं सैन्य सहयोग के लिए हुआ था। चूंकि इस समूह की पहली बैठक मई, 1954 में हॉलैंड के बिल्डरबर्ग होटल में हुई थी, इसलिए इस समूह का नाम बिल्डरबर्ग समूह रखा गया।
इस बैठक में करीब दो तिहाई लोग यूरोप के एवं एक तिहाई उत्तरी अमेरिका के होते हैं। इसके आमंत्रितों में से एक तिहाई राजनीतिक, जबकि दो तिहाई उद्योग, वित्त, शिक्षा, मीडिया जैसे विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियां होती हैं।
इस बैठक में अर्थव्यवस्था, भू-राजनीतिक स्थिति, साइबर चुनौती जैसे बड़े वैश्विक मुद्दों पर गोपनीय विमर्श होता है। इसका न तो कोई स्पष्ट एजेंडा होता है, न ही कोई प्रस्ताव रखा जाता है, न किसी मुद्दे पर वोटिंग होती है और न ही कोई नीतिगत बयान जारी किया जाता है।
यह बैठक इतनी गोपनीय होती है कि आमंत्रित हस्ती भी अपने साथ पति, पत्नी, मित्र, प्रेमिका, अंगरक्षक आदि को नहीं ले जा सकते। आमंत्रित अतिथियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मेजबान देश पर होती है। इस समूह की गोपनीयता इसकी नीयत पर सवाल खड़े करती है और किसी बड़े वैश्विक साजिश की आशंका को बल देती है।
द ट्रू स्टोरी ऑफ द बिल्डरबर्ग ग्रुप नामक बेस्टसेलर पुस्तक के लेखक डेनियल एस्टुलिन का मानना है कि यह समूह संप्रभु राष्ट्रों को उखाड़ने की साजिश के साथ पूरी दुनिया को कॉरपोरेट घरानों एवं नाटो के जरिये नियंत्रित करना चाहता है।