उल्लेखनीय है कि आत्महत्या के कुछ ही घंटे पहले मिड सेमेस्टर परीक्षा के दौरान छात्र को कथित तौर पर मोबाइल पर चैटजीपीटी का उपयोग करते हुए पकड़ा गया था। आत्महत्या के बाद परिजनों की शिकायत पर उक्त प्रोफेसर के खिलाफ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
परिजनों का आरोप है कि उनके बेटे को पिछले काफी समय से जातिगत उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा था। जबकि, संस्थान का कहना है कि उसके एससी/एसटी सेल को छात्र की ओर से कोई शिकायत नहीं मिली। ऐसे में, जरूरी है कि इस पूरे मामले की गंभीर जांच हो और दोषियों को कड़े से कड़ा दंड भी मिले।
आजादी के बाद से देश ने शायद आईआईटी जैसे कुछ ही संस्थान बनाए हैं, जिनकी वैश्विक प्रतिष्ठा हो और जो सही मायनों में भरोसे के प्रतीक रहे हों। लेकिन, अगर एक ही कैंपस में एक वर्ष के भीतर कई छात्रों ने आत्महत्या की हो, तो यह संस्थागत विफलता ही कही जाएगी।
यही नहीं, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2018 से 2023 के बीच देश के विभिन्न आईआईटी संस्थानों में करीब 39 छात्रों ने आत्महत्या की। ये संस्थान आलोचनाओं से परे बिल्कुल नहीं हैं, लेकिन ऐसे हादसों के कारणों को तोड़-मरोड़ कर भी पेश नहीं किया जाना चाहिए कि मूल समस्या ही उसमें तिरोहित हो जाए। इस तरह के संवेदनशील मामलों में राजनीति से बचना चाहिए और अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले जांच के नतीजों का इंतजार किया जाना चाहिए।
कुछ भी हो, इस घटना ने आईआईटी परिसरों में छात्रों पर बढ़ते अकादमिक और सामाजिक दबाव की बहस को फिर सामने ला दिया है। सर्वोच्च न्यायालय की राष्ट्रीय कार्यबल की अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार, आईआईटी के शिक्षकों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जिन्हें मानसिक सेहत संबंधी समस्याओं से जूझ रहे विद्यार्थियों की पहचान और सहायता के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला है। साहिल की आत्महत्या की निष्पक्ष जांच के साथ ही यह भी जरूरी है कि जिन संस्थानों को बनाने में दशकों लगे हैं, वे खुद आत्ममंथन करें और अपनी आंतरिक व्यवस्था को अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप बनाएं।