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वाशिंगटन में चीन की चर्चा: जिनपिंग अमेरिका दौरे पर जा रहे हैं, क्या खस्ताहाल अर्थव्यवस्था पर भी बात होगी?

Tue, 22 Sep 2026 04:28 AM IST
ज्योति भास्कर ली युआन (द न्यूयॉर्क टाइम्स)

सार

इस हफ्ते चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका के राजकीय दौरे पर जा रहे हैं, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के क्षेत्र में चीन की तरक्की पर तो खूब चर्चा होगी, लेकिन क्या उसकी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था का सवाल भी केंद्र में आएगा?
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राष्ट्रपति जिनपिंग और ट्रंप (फाइल) - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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इन दिनों अमेरिकी अखबारों में इसकी खूब चर्चा है, कि ‘एआई के मामले में चीन पर अमेरिका की बढ़त लगभग खत्म हो चुकी है या चीन एआई के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।’ जाहिर है, इस हफ्ते जब शी जिनपिंग वाशिंगटन पहुंचेंगे, तो ऐसी चर्चाओं के बारे में जानकर उन्हें बहुत खुशी होगी।

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शी के नेतृत्व में, चीन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को विकसित करने में बहुत तरक्की की है। लेकिन, वह एक ऐसी अर्थव्यवस्था का भी नेतृत्व करते हैं, जो दशकों में अपनी सबसे खराब हालत में है। ये दोनों बातें आपस में जुड़ी हुई हैं। चीनी अर्थशास्त्रियों और सरकार के करीबी लोगों ने भी चेतावनी दी है कि सरकार एआई जैसी तकनीक पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च कर रही है, जबकि रोजगार बढ़ाने और पूरी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है। देश की अर्थव्यवस्था इस समय मुश्किल दौर से गुजर रही है। अगस्त में युवाओं की बेरोजगारी दर 18.9 प्रतिशत पहुंच गई। लोगों की खर्च करने की क्षमता भी कम हुई है। साल की पहली छमाही में घरेलू कारों की बिक्री पिछले साल के मुकाबले 20 प्रतिशत और घरों की बिक्री 14 प्रतिशत घट गई। इससे पहले से जारी आर्थिक सुस्ती और बढ़ गई है। देश में कीमतें लगातार गिरने का दौर भी जारी है। 

हाल के दिनों में एक सुर में देश के अर्थशास्त्रियों ने चेतावनियां दीं। चीन के केंद्रीय बैंक के पूर्व सलाहकार और सिंघुआ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ली दाओकुई ने कहा कि चीन की अर्थव्यवस्था ‘बहुत धीमी’ पड़ गई है। तेजी से बढ़ते हाई-टेक सेक्टर पूरी अर्थव्यवस्था को ऊपर नहीं उठा सकते। केंद्रीय बैंक के एक अन्य पूर्व सलाहकार लियू शिजिन ने एक फोरम में सुझाव दिया कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की बुनियादी पेंशन की रकम बढ़ाई जाए, ताकि उनकी क्रयशक्ति को बढ़ाया जा सके। उसी फोरम में, केंद्रीय बैंक के सलाहकार हुआंग हाइझोउ ने कहा कि जो देश कीमतों में गिरावट के चक्र में फंसा हो, वह तकनीकी नवाचार हासिल नहीं कर सकता।
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एआई के लिए चीनी सरकार कितनी रकम खर्च कर रही है, उसका सही पता लगाना मुश्किल है। स्टैनफोर्ड की एआई इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार, 2000 से 2023 के बीच सरकारी निवेश फंडों ने एआई कंपनियों में अनुमानित 184 अरब डॉलर का निवेश किया। ब्लूमबर्ग के अनुसार, चीन देशभर में डाटा सेंटर बनाने के लिए अगले पांच वर्षों में करीब 295 अरब डॉलर खर्च करने की तैयारी कर रहा है, जिन्हें सरकारी कंपनियां चलाएंगी। चीन की सत्ताधारी पोलितब्यूरो की नियमित छमाही बैठक से ठीक पहले चीनी अर्थशास्त्रियों की बेबाकी बहुत कुछ बयां करती है। उन्हें बहुत ज्यादा निराशावादी बातें न करने की चेतावनी दी गई थी। जब नेतृत्व आर्थिक नीति में बदलाव करने वाला था, ठीक उससे पहले इन हस्तियों का इतनी साफगोई से बोलना दिखाता है कि वे कितने चिंतित हैं। उनका संदेश साफ था-चीनी अर्थव्यवस्था मुश्किल में है और संसाधनों का एआई-केंद्रित आवंटन आम लोगों की आजीविका और देश के आर्थिक भविष्य के लिए महंगा साबित हो सकता है। 

नेतृत्व ने उनकी चेतावनियों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। पोलितब्यूरो की बैठक के बाद पार्टी ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सक्रिय कदम उठाने की जरूरत मानी। हालांकि, उसने ऐसे प्रोत्साहन उपायों पर ही भरोसा किया, जिनका असर धीरे-धीरे दिखता है। साथ ही, ‘एक समझदार नई अर्थव्यवस्था’ बनाने का वादा किया। सरकारी मीडिया ने पुरानी परंपरा से हटकर घरेलू विकास का कोई लक्ष्य घोषित नहीं किया। साल के पहले पांच महीनों में इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल एस्टेट और उपकरणों समेत फिक्स्ड-एसेट इन्वेस्टमेंट में 4.1 फीसदी की गिरावट आई। केंद्रीय बैंक के पूर्व सलाहकार ली ने कहा कि चीन के इतिहास में ऐसी गिरावट सिर्फ दो बार देखी गई है-1961 में, जब भयंकर अकाल पड़ा था, और 1967 में, जब सांस्कृतिक क्रांति अपने चरम पर थी। हालांकि, तियानमेन स्क्वायर नरसंहार के बाद 1989 में भी गिरावट आई थी।

कई अर्थशास्त्रियों के सुझाव के उलट शी जिनपिंग का मानना है कि सरकार के नेतृत्व में तकनीक लागू करने से पारंपरिक उद्योगों का आधुनिकीकरण होगा और भविष्य में आर्थिक मूल्य पैदा होगा। पर, इन फायदों को हकीकत में बदलने में कई साल लग सकते हैं। चीन एआई की दौड़ से बाहर नहीं रह सकता। 2026 की पहली छमाही में सूचना सेवा क्षेत्र में निवेश 19.2 प्रतिशत बढ़ा। राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के मुताबिक, इस बढ़ोतरी में एआई की अहम भूमिका रही। एआई चीन की अर्थव्यवस्था को बदल सकता है और अमेरिका के साथ तकनीकी मुकाबले में उसकी स्थिति मजबूत कर सकता है। लेकिन सवाल है कि इसके लिए चीन को कितनी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी? ज्यादातर देशों के मुकाबले चीन के पास ज्यादा वित्तीय और मौद्रिक लचीलापन है, क्योंकि बीजिंग का बैंकिंग प्रणाली पर नियंत्रण है। सरकारी मदद वाली तकनीक में लगाया गया हर युआन, रोजगार और खपत पर खर्च नहीं हो पाता। स्टैनफोर्ड में चीनी अर्थशास्त्री शू चेंगगांग ने कहा कि चीन जिस मुश्किल स्थिति में है, उसमें कई सरकारें नौकरियां पैदा करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन का इस्तेमाल करतीं। उन्होंने कहा कि जब लोगों के पास नौकरियां होती हैं, तो वे ज्यादा खर्च करते हैं, जिससे एक सकारात्मक आर्थिक फीडबैक लूप बनता है। इसके बजाय, बीजिंग अपना निवेश एआई में लगा रहा है, एक ऐसी टेक्नोलॉजी, जो कर्मचारियों की मांग कम करके भारी बेरोजगारी को और बढ़ा सकती है। 

चीन ने बार-बार यह दिखाया है कि एक तानाशाह देश ऐसे मॉडल को भी लंबे समय तक चला सकता है, जो असल में टिकाऊ नहीं है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि ‘लंबे समय’ का मतलब ‘हमेशा के लिए’ नहीं होता। बीजिंग के जाने-माने समाजशास्त्री सन लिपिंग ने सोवियत संघ का उदाहरण दिया। अपने चरम पर, उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका की अर्थव्यवस्था का लगभग 70 प्रतिशत थी, और विज्ञान व तकनीक के कुछ क्षेत्रों में वह अमेरिका से आगे निकल गया था। फिर भी, उसकी केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था आखिरकार ठप पड़ गई। सन लिपिंग ने लिखा कि चीन बड़ी मात्रा में लगातार बेहतर होते जा रहे सामान बना सकता है। लेकिन, चीन में उन्हें खरीदेगा कौन? खरीदारों के बिना, सामान बिकता नहीं है, कारोबार को कोई मुनाफा नहीं होता, परिवारों की आमदनी नहीं बढ़ पाती और रोजगार की स्थिति में सुधार नहीं हो पाता। यही आज चीन की अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्या है।

©The New York Times 2026

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