लंबे समय से नेतृत्वविहीनता के फलस्वरूप उत्पन्न राजनीतिक शून्य को भरते हुए नरेंद्र मोदी ने महज पचास दिनों के कार्यकाल में तारीख में अपने लिए एक खास मुकाम हासिल कर लिया है। रेल और आम बजट में इसकी झलक देखी जा सकती है। यूपीए सरकार द्वारा छोड़ी गई चुनौतियों से उबर कर नवीन आकांक्षाओं की ऊंची उड़ान और नवोदित मध्यवर्ग के उदय का बखूबी जिक्र इस बजट में किया गया है। रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे ब्रिक्स के सहयोगी देशों के साथ ही ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, जर्मनी और फ्रांस सरीखे देशों ने भी भारत में अपार संभावनाएं देखते हुए साझा कारोबार के ताने-बाने बुनने शुरू कर दिए है। मगर इस तथ्य पर गौर करना चाहिए कि इन देशों ने लंबे समय से अपने बजटीय प्रावधानों में शिक्षा और संस्कृति जैसे विषयों को जो प्राथमिकताएं प्रदान की हैं, उनकी तुलना में भारत की स्थिति किसी भी मानदंड से अनुकूल नहीं है।
भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में शिक्षा को राष्ट्र के विकास और निर्धनता की समाप्ति के लिए सबसे शक्तिशाली हथियार बताया गया है। गौरतलब है कि उच्च शिक्षा एवं संस्कृति के दोनों अहम क्षेत्रों में चुनावी घोषणापत्र के मार्फत अवाम के साथ किया गया वायदा बहुआयामी और निहायत विस्तृत है। मगर एनडीए सरकार के बजट में इन मदों में जो राशि आवंटित की गई है, वह बेहद नाकाफी है।
बजट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में मानविकी संकाय में जयप्रकाश नारायण उत्कृष्ट राष्ट्रीय केंद्र, जम्मू, छत्तीसगढ़, गोवा, आंध्र प्रदेश एवं केरल में पांच आईआईटी सहित हिमाचल प्रदेश, पंजाब, बिहार, ओडिशा और महाराष्ट्र में पांच नए आईआईएम खोलने के लिए महज पांच सौ करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है। यूपीए सरकार ने भी कई संस्थानों की उद्घोषणा अपने बजटीय प्रावधानों में की थी, पर व्यावहारिक तौर पर इन पर अमल नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री केवल शब्दों के ही मार्फत शैक्षणिक संस्थाओं की गुणवत्ता में ह्रास और नैतिक मूल्यों के क्षरण पर अफसोस जाहिर करते रह गए।
बजट में पांच पर्यटन केंद्रों के लिए पांच सौ करोड़ रुपयों के अलावा धार्मिक यात्राओं तथा आध्यात्मिक विषयों के प्रोत्साहन के लिए सौ करोड़ रुपयों के आवंटन के साथ मथुरा, गया, अमृतसर, कांचिपुरम, अजमेर और वेल्लानकानी जैसे धर्मस्थलों के विकास के लिए दौ सौ करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है। पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालयों के संरक्षण और विस्तार के बगैर भारत की महान ऐतिहासिक विरासत को हम अपनी आने वाली संतति के लिए सुरक्षित कैसे रखेंगे?
‘मोदीफेस्टो’ यानी भाजपा के घोषणा पत्र में शिक्षा पर सरकारी खर्च को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का छह फीसदी करने का जिक्र है, जबकि बजट के मुताबिक यह तीन फीसदी से ज्यादा नहीं है। चीन इस मद में छह फीसदी राशि खर्च करता है और इसका प्रतिफल यह है कि आज उसकी गिनती विकसित राष्ट्रों की जमात में है और हम किसी भी क्षेत्र में कहीं भी नहीं।
(ऑक्सफोर्ड, लंदन तथा हार्वर्ड विश्वविद्यालयों में विजिटिंग फेलो)