दरअसल, बस्तर में अबूझमाड़ का क्षेत्र घने जंगलों की वजह से शीर्ष नक्सली नेताओं का सुरक्षित ठिकाना हुआ करता था, लेकिन अब सुरक्षाबलों के शिविर यहां तक निर्मित हो चुके हैं, ऐसे में ये नक्सली ओडिशा से लगे गरियाबंद के जंगलों में आ गए थे, क्योंकि यह क्षेत्र घने जंगलों और सीमावर्ती होने की वजह से नक्सलियों के लिए उपयुक्त था, जहां से वे मौका पाकर पड़ोसी राज्य में भी जा सकते थे। अभी कुछ ही दिन पहले इसी तरह छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर भी 18 के करीब नक्सली मारे गए थे, जिनमें से कुछ तो लाखों रुपये के इनामी थे। इससे यही पता चलता है कि सरकार द्वारा दिखाई जा रही सख्ती से नक्सलियों के पांव उखड़ रहे हैं।
2010 में बीस राज्यों के 223 जिलों में फैले जिस नक्सलवाद को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था, उसकी तीव्रता में, सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अगर अब करीब 73 फीसदी की कमी आ गई है, तो काफी हद तक इसका श्रेय सरकार के प्रयासों को जाता है। हालांकि नक्सलियों को मिल रहे स्थानीय समर्थन में कमी आना भी इसकी एक प्रमुख वजह साबित हुई है, क्योंकि यही नक्सलियों की सबसे बड़ी ताकत और उनके खिलाफ चलाए जा रहे किसी भी अभियान की विफलता की सबसे बड़ी वजह भी रही है।
देश के न्यूनतम विकसित क्षेत्रों के लगातार विस्थापन का शिकार आदिवासियों को सरकारों से शिकायतें हों, तो यह स्वाभाविक ही है, लेकिन यह भी सच है कि इस वजह से नक्सलियों के आतंक का समर्थन करने वाले कम ही हैं और जो करते भी हैं, उन्हें भी वर्षों के संघर्ष के बाद इसकी निरर्थकता ही समझ आई है। दशकों पुराने नक्सलवाद का दुखद पहलू यह है कि सामाजिक-आर्थिक वजहों से उपजी इस समस्या के समाधान के लिए कभी कोई व्यावहारिक रणनीति विकसित हो ही नहीं सकी। 2026 तक देश भले नक्सल-मुक्त हो जाए, लेकिन सही अर्थों में नक्सलवाद को मिटाने के लिए जरूरी है कि विकास और समृद्धि का प्रकाश देश के कोने-कोने तक पहुंचे।