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देहाती हाट-बाजारों का टूटता ढांचा

सुधीर विद्यार्थी Published by: सुधीर विद्यार्थी Updated Tue, 08 Sep 2020 01:02 AM IST
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दुकानों पर सामान खरीदते लोग - फोटो : अमर उजाला

गांव के हाट-बाजारों की शक्ल अब बदल गई हैं। तीन-चार कोस पर किसी गांव में लगने वाले बाजार में आसपास के आठ-दस गांव के लोग जुटते थे। वे प्रायः मझोले किसान होते और अपनी फसल का थोड़ा-सा हिस्सा बेचने के लिए बैलगाड़ियों में लादकर लाते। छोटी जोत की किसानी करने वाले अपने सिरों पर अनाज रखकर, उसकी बिक्री कर और अपनी जरूरत का सौदा-सुलुफ बांधकर घर लौट जाते। कई बार यह खरीदारी इतनी कम होती कि उन चीजों की खपत दो-तीन दिनों में ही हो जाती और फिर अगले बाजार का बेचैनी से इंतजार होता। 



वहां बिकने वाली वस्तुओं में दाल, मसाले, गुड़, सरसों, मिट्टी का तेल, कुप्पी, साबुन, कंघी और बिसातखाने के दूसरे छोटे-बड़े सामान, कपड़ा, आलू-सब्जी की दुकानें तथा नाई से हजामत बनवाने का भी काम होता। पान और चाट के नुक्कड़ भी सज जाते। मांस-मछली की बिक्री होती, तो भीड़ से थोड़ा हटकर बैलों और घोड़ों के नाल लगाने तथा उनकी पूंछों के बाल कतरने वाले अपने कारोबार में जुटे होते। कोई एक दवाखाना भी उसी घेरे में आ जमा होता। पहले इन बाजारों में मिट्टी के बर्तन भी बिकते देखने को मिल जाते थे, पर अब छोटे घरों में भी उनकी पहुंच नहीं रही। प्लास्टिक ने कुम्हारों की कला को विस्थापित कर दिया है। बाजार में खरीदारों की आवाजों का मिला-जुला शोर बाजार के चरित्र का एक खास और स्थायी हिस्सा होता, जिसे चीन्हना इन दिनों कठिन हो गया है।


गांव में तीसरे दिन या सप्ताह भर में जुड़ने वाले इन बाजारों में अब गंवई स्त्री-पुरुष नहीं आते। मोटे अनाज की पैदावार घटने पर बिक्री के लिए बाजार तक उनका पहुंचना मुहाल होने लगा है। जरूरत की चीजों की खरीदारी के लिए लोग अब मोटर वाहनों से निकटवर्ती कस्बों में जाने लगे हैं। जो पक्की सड़कें गांव के निकट से गुजर कर शहर की तरफ जाती हैं, उनके किनारे बड़ी संख्या में दुकानें उग आई हैं, जिनसे देहात के बाजारों की रौनक कम होने के साथ वहां लोगों की उपस्थिति घटी है। ठंडे पेय और पैकटबंद चीजें बेचने वालों ने अब बाजार की नई संस्कृति विकसित की है। यहां हाट-बाजारों की भांति देहात के लोग मोल-भाव कर चीजें नहीं खरीद सकते। गांव में सब्जी पैदा करने वाले किसान भी अब अपना उत्पाद लेकर मंडी जाते हैं या फिर बिचैलिया उन्हें सीधे खेत से ही उठा लेता है। 


मुक्त अर्थव्यवस्था ने गांव के ढांचे को ही तोड़ा-बदला नहीं, परंपरागत हाट-बाज़ार के परिदृश्य को भी उलट दिया है। खेतों में पैदा मूली, गाजर, आलू, लौकी, तुरई-सब कुछ अब शहर के मॉल में चमकीली पन्नियों में बिकने लगी है। देहाती बाजार अब उजड़ गए हैं। दुकानदारों और ग्राहकों के बीच जमा-जमाया रिश्ता भी दरका है। नए बाजार की संस्कृति अब गांव के छोटे हाट-बाजारों को पनपने भी नहीं देना चाहती। वह अपने व्यावसायिक शातिरपने से उन्हें वीरान करने पर आमादा है। गांव में छोटी जोत वाला बड़े लोगों से अपनी घर-गिरस्ती चलाने के लिए जो उधार-कर्ज लेता था, उसे निपटाने के लिए उसके पास साप्ताहिक बाजार में अनाज बेचकर देने का रास्ता होता था, जिसे नए बाजार ने बंद कर दिया है। एक समय बाजार स्वयं चलकर गांव आता था। तब अनाज के बदले चीजों की खरीदारी का चलन था। रसोई का सामान, मसाले, बरफ, चाट, धान का चूरा जैसी वस्तुओं की अदला-बदली का व्यापार बड़ा दिलचस्प था। बासागुड़ा (छत्तीसगढ़) के साप्ताहिक बाजार में आदिवासी नमक के बदले चिरौंजी बेचा करते थे। अब उस तरह की दुकानदारी नापैद हो चुकी है। सारी खरीदारी नकद पैसे से होने लगी है।


देहात के बाजारों में किसानों की फसल के खरीदार भी छोटे व्यापारी या बनिये हुआ करते थे, जो थोड़ी पूंजी से सप्ताह भर में कुछ कामचलाऊ कमाई करते, पर उनमें किसानों के शोषण की मंडियों जैसी बड़ी घटतौली वाली गुंजाइश नहीं होती थी। नोटबंदी के दौर में गांव के बाजार की यह धुरी जैसे एकदम टूट गई। दुखद है कि उनकी वह रौनक अब तक वापस नहीं लौटी। गरीब जनता के जीवन-यापन में छोटे हाट-बाजार का इस तरह नष्ट होते चले जाना बहुत त्रासद है। गांव की गरीब जनता के घर चलाने में ये लघु बाजार कभी बहुत सहायक थे, जो इन दिनों अंतिम सांसें गिन रहे हैं।

 

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