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धूप आने दो: लक्ष्य प्राप्ति की अडिग आकांक्षा ने बालक ध्रुव को बना दिया तारा

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 17 Dec 2023 08:00 AM IST

सार

विष्णु ने वरदान दिया- मैं तुम्हें ब्रह्मांड का सर्वोच्च स्थान प्रदान करता हूं। तुम अनंत काल तक आकाश का सबसे दीप्तिमान तारा बनकर प्रकाशित होते रहोगे। तुम मानव जाति को अंधकार में मार्ग दिखाओगे।
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ध्रुव तारा। - फोटो : Social Media


एक दिन बालक ध्रुव दरबार में आया तो उसने देखा कि उत्तम, अपने पिता उत्तानपाद की गोद में खेल रहा था। ध्रुव के मन में भी पिता की गोद मैं बैठने की इच्छा हुई। वह सिंहासन की ओर बढ़ने लगा कि तभी सुरुचि ने उसे रोक दिया और बोली, ’तुम उस सिंहासन तक पहुंचने के योग्य नहीं हो। श्रेष्ठ स्थान हर किसी के लिए नहीं होता। पहले उसके योग्य बनो।‘ ध्रुव ने अपने पिता की ओर देखा लेकिन उत्तानपाद चुप बैठे रहे। अपमान और दुख से भरा ध्रुव रोता हुआ अपनी मां के पास पहुंचा और उसने सुनीति को पूरी घटना बताई। सुनीति जानती थी कि उत्तानपाद, सुरुचि के समक्ष विवश थे। उसने ध्रुव से कहा, ‘पुत्र, यही हमारा भाग्य है। इसे स्वीकार कर लो।’


‘किंतु हमारे दुख का कारण क्या है?’ बालक ध्रुव ने पूछा।‘सब कुछ भगवान विष्णु की इच्छा से होता है। वह जिस पर प्रसन्न होते हैं उसे आशीर्वाद देते हैं। उन्हीं के आशीर्वाद से सुख और शांति संभव है।’ सुनीति ने ध्रुव को समझाया। ‘विष्णु प्रसन्न कैसे होते हैं?’ ध्रुव ने प्रश्न किया। ‘तपस्या से! सच्चे मन से उनकी आराधना की जाए तो भगवान अवश्य प्रसन्न होते हैं और फिर हम जो चाहें हमें वह मिल सकता है।’ यह सुनते ही ध्रुव घर छोड़कर वन में तपस्या के लिए निकल पड़ा। सुनीति ने बालक ध्रुव को रोकने का बहुत प्रयास किया किंतु ध्रुव ने बात नहीं मानी। ध्रुव का अर्थ ही होता है - जो अडिग हो!


वन में ध्रुव एक शांत जगह पर बैठकर ध्यान करने लगा। काफी समय बीत गया किंतु विष्णु ने दर्शन नहीं दिए। ध्रुव को थकान होने लगी थी लेकिन तपस्या जारी रही। फिर एक दिन उसे किसी का स्वर सुनाई पड़ा। उसने आंखें खोलीं तो सामने देवर्षि नारद खड़े थे। ध्रुव ने नारद को प्रणाम किया। ऋषि ने ध्रुव से कहा, ‘तुम अपने नाम की भांति अडिग हो। परंतु भगवान विष्णु की कृपा चाहिए तो सही मंत्र का उच्चारण करना आवश्यक है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय – इस मंत्र का उच्चारण करो।“ यह कहकर नारद अंतर्धान हो गए। नारद के जाने के बाद ध्रुव ने मंत्रोच्चारण के साथ विष्णु की उपासना आरंभ कर दी। मंत्र के प्रभाव से ध्रुव के भीतर अद्भुत ऊर्जा का संचार होने लगा, उसकी थकान दूर हो गई और उसका रोम-रोम विष्णु नाम से स्पंदित हो उठा।


ध्रुव की तपस्या और प्रचंड हुई तो उसकी गूंज से देवलोक कांपने लगा। उसकी आराधना को भंग करने के अनेक प्रयास किए गए किंतु ध्रुव टस से मस नहीं हुआ। आखिर भगवान विष्णु ने ध्रुव को दर्शन दिए। ‘ध्रुव!’ विष्णु ने कहा, “मैं तुमसे प्रसन्न हूं। बोलो, क्या चाहिए?’ विष्णु का अलौकिक रूप देखकर ध्रुव पुलकित हो गया। भगवान के दर्शन ने उसकी समस्त इच्छाओं को पूरा कर दिया था। विष्णु ने फिर पूछा, ‘बोलो ध्रुव, तुम्हें क्या चाहिए?’ ध्रुव ने मन में सोचा, ‘यदि भगवान विष्णु मुझसे प्रसन्न हैं तो उनसे कोई क्षणभंगुर वस्तु क्यों मांगू? मैं उनसे कोई स्थायी वस्तु प्रदान करने को कहूंगा; एक ऐसा वरदान, जो किसी और के लिए प्राप्त करना लगभग असंभव हो।’


तभी ध्रुव को सुरुचि के शब्द याद आए : श्रेष्ठ स्थान हर किसी के लिए नहीं होता। पहले उसके योग्य बनो।‘ ‘मुझे सर्वश्रेष्ठ स्थान चाहिए!’ ध्रुव ने कहा। ‘कोई ऐसा स्थान, जिसके सामने संसार के अन्य सभी स्थान तुच्छ हो जाएं।’ ‘तथास्तु!’ विष्णु ने मुसकराकर कहा। ‘मैं तुम्हें ब्रह्मांड का सर्वोच्च स्थान प्रदान करता हूं। तुम अनंत काल तक आकाश का सबसे दीप्तिमान तारा बनकर प्रकाशित होते रहोगे। तुम मानव जाति को अंधकार में मार्ग दिखाओगे।’ इस तरह भगवान विष्णु से वरदान पाकर बालक ध्रुव, तारा बन गया जो आज पूरे संसार का पथ-प्रदर्शन करता है।

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