देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्र पठानकोट में वायुसेना के हवाई अड्डे पर हुए आतंकी हमले पर हैरान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ऐसी आशंका प्रधानमंत्री मोदी के लाहौर पहुंचते ही व्यक्त की जा रही थी। जब भी भारत बातचीत की पहल करता है, वहां के आतंकी पाकिस्तानी सेना के इशारे पर ऐसी हरकत करते हैं। हैरानी की बात है कि आतंकियों ने 31 दिसंबर को गुरदासपुर के पुलिस अधिकारी के साथ मारपीट की, एक टैक्सी ड्राइवर से गाड़ी छीनी, फिर भी पंजाब पुलिस आतंकियों को तलाश नहीं पाई। चौबीस घंटे से ज्यादा समय तक ये छह आतंकी उस क्षेत्र में रहे, पर पुलिस इनका पता नहीं लगा सकी। यह आतंकी हमला हमारी आंतरिक सुरक्षा की पोल खोलने के लिए काफी है।
यदि हम अपने पड़ोसी से संबंध सुधारना चाहते हैं, तो पहले हमें अपनी आंतरिक सुरक्षा को मजबूत बनाना होगा और यह मानकर चलना होगा कि वहां की सेना तथा आतंकी गुट इसमें कदम-कदम पर बाधा डालेंगे। जिस तरह से वाजपेयी की लाहौर यात्रा के समय तत्कालीन सेना प्रमुख मुशर्रफ प्रोटोकॉल के अनुसार लाहौर गवर्नर हाउस में स्वागत के लिए मौजूद नहीं थे, उसी तरह प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के समय जनरल राहील शरीफ की लाहौर हवाई अड्डे पर गैर मौजूदगी दर्शाती थी कि वहां की सेना दोनों मुल्कों के रिश्ते की गर्मजोशी से खुश नहीं है। ताजा हमला इसका संकेत है कि वहां की लोकतांत्रिक सरकार का आतंकी गुटों और सेना पर कोई नियंत्रण नहीं है।
पाकिस्तान के साथ शांति एवं अच्छे संबंधों की आशा रखने वालों को ऐसी हरकतों के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि वहां की सेना भारत को दुश्मन मानती है। वह यह भी जानती है कि सीधे मुकाबले में वह भारत से नहीं जीत सकती, इसलिए उसने भारत के विरुद्ध आतंकवाद के जरिये परोक्ष युद्ध की योजना बनाई। आतंकी घटनाएं करवाने की जिम्मेदारी उसने आईएसआई को सौंप रखी है और भारत विरोधी आतंकी संगठनों की बागडोर आईएसआई के नियंत्रण में है। कुछ समय पहले आईबी को सूचना मिली थी कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में दिसंबर के दूसरे हफ्ते में एक गुप्त बैठक हुई, जिसमें भारत में दोबारा आतंकी गतिविधियां शुरू करने और जम्मू को गुरदासपुर से जोड़ने वाली सड़क पर कब्जा करके जम्मू-कश्मीर को बाकी देश से अलग-थलग करने की योजना बनी। इस क्षेत्र में अक्सर पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ होती है।
ऐसे में देश के राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों को पाकिस्तान की सेना एवं उसके आतंकी गुटों से मिलने वाली चुनौतियों का आकलन करना चाहिए। खासकर, उन्हें जमीनी एवं जल-सीमा के साथ भारत की सांप्रदायिक संरचना पर ध्यान देना चाहिए। हाल ही में गिरफ्तार हुए आईएसआई के एजेंटों से पूछताछ में संकेत मिले हैं कि देश के विभिन्न भागों में इनके एजेंट स्लीपिंग सेल के रूप में हैं, जो अपने आकाओं का हुक्म मिलते ही हरकत में आ जाते हैं। ये सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ कर दंगे भड़काने की कोशिश करते हैं। अतीत में ऐसी घटनाएं देखने को मिली ही हैं। पुलिस के गैर पेशेवराना रवैये को देखते हुए ये अपने इरादों में सफल हो जाते हैं। आज के युग में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस पुलिस की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी सीमा सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक से लैस सेना की। इसलिए आंतरिक सुरक्षा को मजबूत बनाना जरूरी है।
लेखक, सेवानिवृत्त कर्नल हैं