भारतीय लोकतंत्र के लिए आज का दिन बहुत खास है। आज यह पता चलेगा कि केंद्र की सत्ता में अगले पांच साल तक कौन रहने वाला है। भारत में पिछले करीब डेढ़ महीने तक चली चुनावी प्रक्रिया में अनेक मुद्दे उठाए गए। बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा भी उठाया गया। भाजपा नेता नरेंद्र मोदी का कहना था, घुसपैठिये अपना सामान समेट लें। जबकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह रही थीं, बांग्लादेशियों को छूने की कोई हिम्मत भी न करे। लेकिन इस आधार पर ममता बनर्जी को बांग्लादेशियों का दोस्त नहीं मान लेना चाहिए। बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए उनका प्रेम दरअसल राजनीतिक स्वार्थ से उपजा है। उनके प्रति ममता बनर्जी के मन में इतना ही सम्मान होता, तो वह पश्चिम बंगाल से मुझे बाहर नहीं करतीं। बांग्लादेश के प्रति ममता बनर्जी को अगर इतना ही स्नेह होता, तो वह तीस्ता के जायज पानी से बांग्लादेश को वंचित नहीं करतीं।
बांग्लादेशी मुस्लिमों के उलट वहां से भारत आने वाले हिंदुओं के बारे में कहा जाता है कि वे उत्पीड़ित हैं। यह तथ्य गलत नहीं है। लेकिन क्या मुस्लिम पीड़ित नहीं हो सकते? क्या उन्हें निशाना नहीं बनाया जा सकता? और वैसी स्थिति में क्या वे राजनीतिक शरणार्थी नहीं हो सकते? संयुक्त राष्ट्र के 1951 के शरणार्थी समझौते के अनुसार, इसके किसी भी सदस्य देश में किसी को राजनीतिक शरण लेने का अधिकार है। अगर वे आर्थिक शरणार्थी हैं, तब भी उन्हें खदेड़ना उचित नहीं। मानवता के तकाजे में दुनिया के ज्यादातर देश आर्थिक शरणार्थियों को अपने यहां पनाह देते ही हैं। फिर भारत क्यों न दे? अगले कुछ दशक में जब बांग्लादेश समुद्र के बढ़ते जलस्तर के कारण जलमग्न होगा, तब शेष दुनिया को जलवायु परिवर्तन के इन शरणार्थियों को पनाह देना सीखना ही होगा।
बेहतर जीवन जीने के लिए मनुष्य हमेशा ही एक जगह से दूसरी जगह जाता है। यह मनुष्य के स्वभाव में है। बांग्लादेश एक गरीब देश है। इसलिए मौका मिलने पर वहां के लोग यूरोप-अमेरिका जाते हैं। वहां जाना संभव न हुआ, तो मध्य पूर्व या पूर्व के दूर के देशों में जाते हैं। वहां भी जाना संभव न हुआ, तो वे भारत आते हैं। यह समझने की बात है कि भारतीय अगर बांग्लादेश जैसे किसी मुल्क के बाशिंदे होते, तो वे भी ऐसा ही करते। वैसी स्थिति में वे भी शरण लेने के लिए, रोजगार के लिए, बेहतर जीवन यापन के लिए पड़ोसी देशों में घुस पड़ते। भारतीय भी बेहतर अवसर की तलाश में बाहर जाते ही हैं। अमेरिका में अवैध घुसपैठियों के मामले में पहले नंबर पर चीन, दूसरे नंबर पर फिलीपींस और तीसरे नंबर पर भारत है। मैं किसी सरहद पर यकीन नहीं करती। यह पूरी पृथ्वी दूसरे जीवों की तरह मनुष्य के लिए भी है। दूसरे प्राणियों की तरह मनुष्य को भी पृथ्वी के किसी भी इलाके में जाने और बसने का अधिकार है। लेकिन मनुष्य ही मनुष्य को इस अधिकार से वंचित करता है। इस विशाल ब्रह्मांड में संभवतः पृथ्वी ही एकमात्र ग्रह है, जहां मनुष्य का निवास है-लेकिन यहां मनुष्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है।
भारत के चुनावी नतीजों के बारे में संभावना यह जताई जा रही है कि नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में आ रहे हैं। उनके समर्थक जहां भाजपा के बहुमत में आने की बात कर रहे हैं, वहीं एक दूसरा वर्ग है, जिसका मानना है कि चाहे गठजोड़ के सहारे ही सही, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनाने जा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सत्ता में आने पर नरेंद्र मोदी क्या सचमुच बांग्लादेशी मुसलमानों को भारत से बाहर करेंगे। इस पर यकीन नहीं होता। क्योंकि अगर वह ऐसा करेंगे, तो वह पूरी दुनिया की निंदा के पात्र बनेंगे। गुजरात में वर्ष 2002 में मुसलमानों को निशाना बनाने के कारण उनकी छवि पहले ही धूमिल है। अमेरिका ने अभी तक उन्हें वीजा नहीं दिया है। इस बार के चुनाव में भारतीय उद्योगपतियों के समुदाय ने मोदी को जिताने के लिए पानी की तरह पैसा बहा दिया है।
पर घुसपैठियों पर नरेंद्र मोदी का कठोर रुख नुकसानदेह हो सकता है। मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों में लाखों भारतीय हिंदू नौकरी कर रहे हैं। मध्य पूर्व के देश अगर मोदी के विरोधी हो जाएं, तो भारत के लिए नई मुसीबत पैदा होगी। सत्ता में आने से पहले बहुत कुछ कहा जा सकता है। लेकिन भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में सत्ता में आने पर ठंडे दिमाग से काम करना पड़ता है। इसलिए लंबे समय तक केंद्र की सत्ता में रहने के लिए मोदी को मजहब की राजनीति बंद करनी पड़ेगी।
भारत के चुनावी नतीजे पर दूसरे देश भी नजर रखे हुए हैं। बांग्लादेश में खालिदा जिया भारत के बदलते घटनाक्रम से बेहद खुश हैं। हों भी क्यों न, इतने समय बाद भारत में कांग्रेस की विदाई की संभावना जो दिख रही है। कांग्रेस अवामी लीग का समर्थन करती आई है। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो शेख हसीना को भारत की मदद नहीं मिलेगी। इसीलिए बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमाते इस्लामी की खुशी का ठिकाना नहीं है। कट्टर मुसलमान और कट्टर हिंदू में फर्क नहीं है। ये दोनों समाज को पीछे ले जाना चाहते हैं, इसलिए दोनों भाई-भाई हैं। मजहब पर आधारित राजनीतिक पार्टियों का जब तक भारतीय उपमहाद्वीप में वजूद रहेगा, तब तक वास्तविक प्रगति का रास्ता बंद ही रहेगा। शिक्षित, सजग और प्रगतिशील लोगों को चाहिए कि वे इन नारी विरोधी, धर्मांध दलों को जड़ जमाने न दें। तलवार से नहीं, मार-काट से नहीं, बमबारी करके नहीं, मनुष्य को तर्क, बुद्धि, विवेक और वैज्ञानिक चेतना से लैस करना ही समस्या का समाधान है।