साहिर से मेरी पहली मुलाकात हैदराबाद के स्टेशन पर हुई। वहां प्रगतिशील लेखकों का सम्मेलन था और बंबई से एक अच्छा-खासा काफिला रवाना हुआ था। इस काफिले में मैं भी था।
मुलाकात के बाद बातचीत शुरू हुई तो साहिर की आत्मकथा कुछ बहुत अधिक भिन्न नहीं निकली। लुधियाना के एक जागीरदार के चश्मो-चिराग हैं।
आरंभिक शिक्षा के पड़ाव तय करके जब कॉलेज में पहुंचे, तो दूसरा महायुद्ध छिड़ गया। कॉलेज से बाहर निकले, तो जरूरत की सभी चीजें चोर-बाजार में पहुंच चुकी थीं और हिंदुस्तान के पूर्वी हिस्से में इतना बड़ा अकाल पड़ा कि तीस लाख लोग एड़ियां रगड़ कर मर गए।
इन हालात में जिंदगी जो शक्ल कबूल करती है, वह हमारे लिए अजनबी नहीं, मगर साहिर की दास्तान का एक नया कांड भी है। साहिर के वालिदे-बुजुर्गवार ने ग्यारह शादियां की थी।
साहिर अभी किशोरावस्था में ही थे कि उनकी मां और वालिद के संबंध खराब हो गए और नई मुसीबत पैदा हो गई कि साहिर किसके पास रहें? जागीरदार बाप को एक वलीअहद की जरूरत थी और बदकिस्मती से साहिर के अलावा उनकी कोई औलाद नहीं थी, इसलिए उन्होंने घर का झगड़ा कोर्ट में पहुंचा दिया।
साहिर मैजिस्ट्रेट के सामने पेश हुए और उन्होंने मां के पास रहने की इच्छा प्रकट की। अब साहिर के वालिद को उनसे क्या दिलचस्पी हो सकती थी? ‘खून और रूह के रिश्ते’ रोज-ब-रोज झूल खाते चले गए, यहां तक कि साहिर ने जब पढ़ना शुरू किया, तो उनके वालिद ने अपनी बड़ी तौहीन महसूस की कि इतने बड़े जागीरदार का बेटा स्कूल क्यों जाता है?
जब उन्होंने यह सुना कि उनका ‘वलीअहद’ ‘अब्दुलहमी’ साहिर हो गया है और शेर कहता है, तो गुस्सा नफरत में बदल गया। उनको तालीम मां और मामू ने दिलवाई।
मैं साहिर को बहुत करीब से देख चुका हूं। वे जितने कामयाब हुए, उतने ही अच्छे दोस्त भी बने। जो खालूस उनके फन में है, वही शख्सियत में है। जो भोलापन उनके चेहरे पर है, वही लहजे में है।
ऐसा महसूस होता है कि साहिर ने अपनी शख्सियत का सारा गुदाज शायरी में भर दिया है और शायरी की सारी जजबीयत अपने खादो-खाल में जज्ब कर ली है। जिन दिनों साहिर लुधियाना से हिंदुस्तान कलामंदिर (मुंबई) में आए, मैं लखनऊ में था।
नई-नई कंपनी और नई-नई मुलाजमत, लेकिन पहुंचते ही उन्होंने हर ऐसे दोस्त को जो फिल्मी दुनिया की सैर करना चाहता था, बुलाना शुरू कर दिया। जब लखनऊ से वापस आया और उनसे मिलने गया तो वह एक कमरा भर दोस्त जमा कर चुके थे।
साहिर की जिंदगी में दोस्तों का बड़ा दखल है। वे एक दिन भी अकेले नहीं रह सकते। जहां जाते हैं, वहां कुछ लोगों को अपना पता लिखा देते हैं या फिर उनका पता लिख लाते हैं।
इस सिलसिले में अगर उनको कुछ खोना पड़े, कुछ त्यागना पड़े तो कभी गुरेज नहीं करेंगे। इस तरह भरती की जाए तो बहादुर और बुजदिल हर तरह के रंगरूट मिलेंगे। फिल्मी दुनिया से ताल्लुक या दिलचस्पी रखने वालों के पास आजकल काफी वक्त है और उनमें से अक्सर साहिर के दोस्त बन गए हैं।
बंबई के आवास में साहिर ने नज्में कम, पैसा ज्यादा पैदा किया, मगर अपने लिए नहीं, टैक्सी वालों के लिए...दोस्त, टैक्सी, ऑमलेट- साहिर की जिंदगी में तीन सुर्खियां यह भी हैं। कुछ दोस्तों का ख्याल है कि अगर साहिर शादी कर लें तो उनकी जिंदगी में बड़ी हद तक संतुलन पैदा हो जाए।
यकीनन हो जाए, मगर शादी करने के लिए भी तो संतुलन की जरूरत है। पच्चीस बरस की उम्र में तीन-चार हादसे तो ऐसे हो चुके हैं कि शादियां उन पर मंडराती रहीं और मंडरा कर रह गयीं, मगर साहिर हर बार बच निकले।
अब न तो कैफी आजमी साहब हमारे साथ हैं और न ही साहिर लुधियानवी। लेकिन एक बडा शायर जब दूसरे बड़े शायर पर लिखता है तो फिर शब्दों के लिए दशक और वर्ष का कोई मतलब नहीं रह जाता। कई साल पहले लिखे गए कैफी आजमी के इस संस्मरण का अंश सुरजीत के सौजन्य से। सं.