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जनांदोलन के रास्ते पर ब्राजील

Fri, 28 Jun 2013 09:40 PM IST
दीपक भोजवाणी
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यदि हम भूमध्यसागर के आसपास के देशों की तरफ नजर डालें, तो लगता है कि वातावरण में क्रांति की लहर है। अटलांटिक महासागर के दूसरी तरफ के देश ब्राजील को, जो लैटिन अमेरिका का एक समृद्ध मुल्क एवं निर्विवाद नेता है, एक अलग तरह के संकट का सामना करना पड़ रहा है। वहां जो जनाक्रोश दिख रहा है, उसकी शुरुआत जून के प्रारंभ में हुई, जब बस के न्यूनतम किराये में सात फीसदी की वृद्धि की प्रतिक्रिया में क्षुब्ध लोग सड़कों पर उतर पड़े।
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किसी राजनीतिक दल के सहयोग के बिना सोशल नेटवर्किंग साइटों के जरिये चलाया गया किराये में बढ़ोतरी वापस लेने का यह आंदोलन ब्राजील के दर्जनों शहरों तक फैल गया। मूवमेंट फोर फ्री फेयर्स नामक एक संस्था वहां वर्षों से स्थानीय परिवहन सेवाओं को किराया मुक्त करने की मांग कर रही है। सरकार की निष्क्रियता का सुबूत यह है कि उसे इस आंदोलन के इतना जोर पकड़ लेने का कोई अंदाजा ही नहीं था। पुलिस की जवाबी हिंसा से घायलों की संख्या बढ़ी, जिससे प्रदर्शनकारी भी हिंसक हो गए। नतीजतन अत्यंत ज्वलंत मुद्दे को भड़कने में देर नहीं लगी। किराये में बढ़ोतरी पर क्षोभ तो तात्कालिक वजह है, सच्चाई यह है कि बढ़ती महंगाई, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाओं की अपर्याप्तता और सर्वव्यापी राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण लोग पहले से ही सरकार से नाराज हैं।

वर्कर पार्टी की डिल्मा रॉसेफ ने जनवरी, 2011 में जब लोकप्रिय राष्ट्रपति लुइज इनासियो लुला डा सिल्वा से सत्ता अपने हाथ में ली थी, तब ब्राजील की अर्थव्यवस्था मजबूत थी। डिल्मा की सरकार ने भूख उन्मूलन, सामाजिक कल्याण, स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए नकद हस्तांतरण, टीकाकरण जैसे सामाजिक कल्याण से जुड़ी लूला की नीतियों को जारी रखा। इसके अलावा उन्होंने आबादी के अत्यंत निर्धन लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए 'खुशहाल ब्राजील' योजना भी शुरू की। उल्लेखनीय है कि मौजूदा इक्कीसवीं सदी में ही ब्राजील समृद्धि की सीढ़ियां चढ़ा है। इस दौरान 19.5 करोड़ की उसकी आबादी में से चार करोड़ से भी अधिक नागरिक उभरते मध्यवर्ग की श्रेणी में शामिल हुए हैं। ब्राजील का अंतरराष्ट्रीय कद तब और बढ़ा, जब इसे वर्ष 2014 के फीफा फुटबाल वर्ल्ड कप की मेजबानी सौंपी गई। वर्ष 2016 में वहां ओलंपिक खेल भी होने वाले हैं।
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यह देश अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भरोसा जीतने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ऐसे आरोप हैं कि भ्रष्टाचार के कारण इन अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं के लिए जरूरी इनफ्रास्ट्रक्चर निर्माण का खर्च बजट से बहुत ऊपर चला गया है।

प्रदर्शनकारियों ने अब इस पर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि भारी आर्थिक असमानता के लिए कुख्यात इस देश में अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए इतना ज्यादा खर्च करने का क्या औचित्य है, जिससे समाज के निर्धन वर्गों को कोई फायदा नहीं होने वाला। वर्ष 2012 में एक फीसदी से भी कम की आर्थिक विकास दर, बेरोजगारी में बढ़ोतरी के साथ वेतन में कटौती की आशंका तथा सामाजिक सुरक्षा एवं सार्वजनिक सेवाओं में अपेक्षित राहत न मिलने से मध्यवर्ग पर दबाव बढ़ना शुरू हो गया है।

हाल के वर्षों में वर्कर पार्टी की सरकार भ्रष्टाचार के कारण संदेह के घेरे में है। राष्ट्रपति लुला के शासनकाल में आपराधिक गतिविधियों के लिए वर्कर्स पार्टी के अधिकारियों की आलोचना हुई थी। सबसे हैरत तो यह है कि दागी लोगों को अब तक सजा भी नहीं सुनाई गई है। यहां तक कि राष्ट्रपति के वरिष्ठ अधिकारियों पर लगे गंभीर आरोपों के बावजूद उन्हें छुट्टा छोड़ दिया गया है।

शुरू में कठोर रवैया अपनाने के बाद राष्ट्रपति रॉसेफ को पीछे हटना पड़ा है। इसके बावजूद किराये में वृद्धि को वापस लेने का फैसला नाकाफी होने के साथ ही देर से उठाया गया कदम है। मूवमेंट फॉर फ्री फेयर्स के प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद अपनी राजनीतिक पकड़ बनाने की कोशिश में राष्ट्रपति ने घोषणा की कि सरकार संविधान सभा के गठन के लिए जनमत संग्रह कराएगी। प्रस्तावित संविधान सभा ब्राजील की राज्यव्यवस्था के बुनियादी ढांचे पर गहन विचार करेगी। चूंकि अगले साल वहां चुनाव होने वाले हैं, इसलिए पहले इस कदम को अव्यवहारिक माना जा रहा था और अब बुनयादी ढांचों में बदलाव के लिए जनमत संग्रह का प्रस्ताव दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सरकार परिवहन ढांचे, स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर अरबों डॉलर खर्च करने को प्रतिबद्ध है।

इसी बीच ब्राजील का चिंतित सत्ता प्रतिष्ठान विरोध को शांत करने में जुट गया है। किराये में वृद्धि को वापस लेने के बाद वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने एक पूर्व सांसद नातान डोनाडोन को भ्रष्टाचार का दोषी ठहराए जाने के फैसले को सही मानते हुए उन्हें तेरह वर्षों के लिए जेल भेज दिया। 1988 में संविधान लागू होने के बाद यह पहला मौका है, जब ब्राजील के किसी सांसद को जेल भेजा गया है।

बहरहाल लोगों का विरोध प्रदर्शन अभी थमा नहीं है। वहां विरोध इसलिए भी जारी रहेगा, क्योंकि लोगों को नहीं लगता कि राजनेता अपने वायदों पर टिके रहेंगे। यह भी स्पष्ट नहीं है कि संभावित जनमत संग्रह कैसे कराया जाएगा। जो भी हो, इतना साफ है कि इस देश को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा की कीमत चुकानी पड़ी है। वहां की सरकार को एहसास हो गया है कि लोगों की समस्याओं का समाधान करना ही होगा और वैश्विक कद की तुलना में देश के लोगों की समृद्धि एवं खुशी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
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(लेखक लैटिन अमेरिकी देशों में राजदूत रहे हैं)
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