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मुद्दा: पुस्तक से पुस्तक के जन्म की कहानी पुरानी है

श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Thu, 07 May 2026 07:42 AM IST

सार

बिहारी लाल हरित ने रामचरितमानस  की तर्ज पर भीमायण  महाकाव्य की रचना की थी। ऐसे काव्य प्रयास पहले भी होते रहे हैं और आज भी जारी हैं।  
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किताबों की दुनिया - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


हाल के दिनों में भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी सुनील कुमार गौतम ने अनुच्छेदों को पद्य रूप में प्रस्तुत कर संविधान काव्य शीर्षक से एक खंडकाव्य प्रकाशित कराया। इसकी बानगी देखिए-‘प्रजातंत्र का मुख्य तंत्र है निर्वाचन आयोग।/इसकी मदद से सरकारों को चुनते हैं लोग।/चुनाव आयोगों को देता है संविधान सुरक्षा।/स्वतंत्र चुनावों से होती है, प्रजातंत्र की रक्षा।’ ऐसे में, हमें पुस्तक-संग्रह की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए। पाठकीय रुचियों में विविधता होना अच्छी बात है।


बेशक इस ‘डिजिटल युग’ में विश्व साहित्य की बड़ी से बड़ी लाइब्रेरी मोबाइल इंटरनेट द्वारा मौजूदा पीढ़ी की मुट्ठी में आ गई है। कृत्रिम मेधा ने पुस्तकों के अध्ययन और लेखन मार्ग में बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, पर मुद्रित पुस्तकें केवल सूचनाएं भर नहीं देतीं, अपितु मानवीय संवेदनाएं साझा करने का मौका देती हैं। ऐसे में किताबें पढ़ने और लिखने की स्पर्धा बच्चों में छिड़नी चाहिए। बच्चों से बच्चे अधिक सीखते हैं। बड़ों से उन्हें प्रोत्साहन मिलता है। मसलन पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा है, ‘किताब के पन्नों में ही समाधान है।’ 12 वर्ष की अभिजिता की चार किताबें प्रकाशित होने जैसी खबरें हमें बाल लेखकों के प्रति आश्वस्त करती हैं। आठवीं कक्षा के छात्र आयुष सिंह ने 12-13 साल की उम्र में दो दर्जन बाल सुलभ कहानियों का संग्रह वरिष्ठ बाल लेखक प्रयाग शुक्ल को समर्पित किया है। इसलिए, हमें बच्चों के विषय और रुचियों के अनुरूप अपने आसपास पुस्तक-प्रेम का माहौल सृजित करना चाहिए। बच्चों की सयानी बातें बड़ों की बचकानी बातों से ज्यादा वजनी हो जाती हैं।


किताबें बचपन को संयम, सपने और सहृदयता देती हैं। वे निर्धनतम बच्चे को अब्राहम लिंकन बनाती हैं। पाठक की सोई हुई संभावनाएं जगाती हैं। किसी-किसी किताब का संदेश आजीवन व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। 16 वर्षीय बालक आंबेडकर को उनके पिता के मित्र शिक्षक कृष्णा जी अर्जुन केलूस्कर ने बुद्धचरित पुस्तक भेंट की थी। ध्यातव्य है डॉ. आंबेडकर ने जीवन की आखिरी किताब द बुद्धा एंड हिज धम्म की भूमिका पूरी करके ही अंतिम सांस ली थी। वही बालक आंबेडकर आगे चलकर पुस्तकों के सबसे बड़े संग्रहकर्ता हुए। अंतिम समय में मुंबई के उनके ‘राजगृह’ में 35 हजार निजी किताबों का अनमोल खजाना था। कहने का तात्पर्य कि अच्छी किताबों का असर भी अच्छा और संदेश स्थायी होता है। बालक की अभिरुचि पहचान कर ही किताबें उपलब्ध कराना उन्हें सही प्रोत्साहन देना होता है।

इस लेखक को वे दिन याद हैं, जब गांव नदरोली में स्वतंत्रता सेनानी यदुनाथ और रघुनाथ शास्त्री गांव की लड़कियों को नि:शुल्क पढ़ाते थे। दोनों ही बड़े स्वाध्यायी थे। उन्होंने स्वामी दयानंद का सत्यार्थ प्रकाश पढ़वाया था। दसवीं में पढ़ाई के दौरान मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के प्रशिक्षु डॉ. नत्थू लाल ने लिखा था कि अगर तुम दसवीं पास कर लो, तो मैं तुम्हें बहुत अच्छी किताबें दूंगा। बशर्ते, तब तक तुम कोर्स पर ध्यान केंद्रित करो और पाठ्यक्रम से बाहर की किताबें पढ़ने की अपनी इच्छा को तब तक मुल्तबी कर दो। वह दिन आया, जब हम चंदौसी में मिले। उपहार में मिलने वाली चार-पांच किताबों में एक थी, हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला, जिसे उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में स्वयं कवि के कंठ से सुना था।


यह वाकया 1978 का है, तब से आज तक न जाने कितनी किताबें पढ़ीं-पढ़ाईं, समीक्षाएं कीं, परंतु उन दिनों जो लेखकीय प्रेरणा मधुशाला से मिली, वह किसी और से नहीं मिली। ग्यारहवीं में छात्र सभा का अध्यक्ष और बाल कवि था। मधुशाला  के प्रभाव में लिखी विद्यालय कविता पर उसका असर पड़ा। किताब केवल सूचनाएं नहीं देतीं, बल्कि संवेदनशीलता और रागात्मक नजरिया भी देती हैं। किताब हमारा भाषाई संस्कार संवारती हैं। शब्द भंडार में वृद्धि कर उपयुक्त शब्दों से हमारी अभिव्यक्ति और वाणी को प्रभावी बनाती हैं।

-लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफेसर एवं पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष हैं।
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