चीन की हमलावर-विस्तारवादी कुचेष्टाओं पर लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की द्विपक्षीय वार्ता 'सकारात्मक' वातावरण में समाप्त हो गई। दोनों पक्षों ने भविष्य में फिर बात करने के संकेत दिए हैं। कूटनीतिक चाशनी में पगे हुए इन शब्दों का अर्थ यह है कि चीन पूर्वी लद्दाख के पैंगांग सो, गलवां और गोगरा क्षेत्रों में कई किलोमीटर तक हुई अपनी घुसपैठ को निरस्त करने पर तैयार नहीं हुआ और भारत मई के पूर्व की स्थिति बहाल करने से कम पर समझौता कर नहीं सकता।
पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के स्पष्ट उल्लंघन का फैसला चीन के स्थानीय कमांडरों का नहीं रहा होगा, इसलिए अब कूटनीतिक-राजनीतिक स्तर पर प्रयासों का इंतजार करना चाहिए। आने वाले दिनों में चीन ने अगर कोई नया आक्रामक कदम नहीं उठाया, तो सीमाओं पर तनावपूर्ण शांति बनी रह सकती है। तनाव नाथू ला (पूर्वी सेक्टर) मोर्चे और मध्य सेक्टर (उत्तराखंड-हिमाचल) में भी चल रहा है, मगर वहां विस्फोटक हालत फिलहाल नहीं है। इसलिए छह जून की वार्ता पूर्वी लद्दाख पर ही केंद्रित रही।
एक दिन पहले, पांच जून को दोनों देशों के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों में हुई वार्ता के बाद जारी बयान में कहा गया, 'एक-दूसरे की संवेदनशीलता,सरोकारों और आकांक्षाओं के प्रति सम्मान के महत्व को ध्यान में रखते हुए सहमति रही कि मतभेदों को शांतिपूर्वक हल किया जाए और उन्हें विवादों का रूप न लेने दिया जाए।' चीन ने अलग बयान जारी कर कहा, 'दोनों पक्ष इस सहमति पर अमल के लिए राजी हैं कि वे एक-दूसरे के लिए खतरा नहीं हैं।'
चीन के बयान का यह अंश खासतौर से गौरतलब है,'दोनों देश एकपक्षीयता, संरक्षणवाद, वर्चस्ववाद का विरोध करते हुए बहुपक्षीयता का दृढ़ता से समर्थन करते हैं और विकासशीलों देशों के आम हितों की रक्षा करेंगे।' लगता है, चीन भारत को फंसा रहा है। अमेरिका की ओर चीन का इशारा बहुत साफ है। उसकी नजर में वर्चस्ववाद और संरक्षणवाद का दोषी अमेरिका है। भारत ने यह कभी नहीं माना। सोवियत संघ से दोस्ती के दौर में भी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो अमेरिका से रिश्तों में 'अतीत की झिझक' तोड़ चुके हैं।
चीन का व्यवहार रामनामी दुपट्टा ओढ़े भेड़िये की याद दिलाता है। पहले नए-नए मतभेद पैदा करना, उन्हें विवादों का रूप देना और फिर सैनिक टकराव की परिस्थितियां पैदा करना, तो आधुनिक इतिहास में सिर्फ चीन का काम है। पूर्वी लद्दाख में मई तक शांति थी, आगे बढ़ कर भारत की जमीन हथियाई चीन ने। इसके बाद भारी सैनिक जमावड़ा कर लिया। मध्य सेक्टर वस्तुतः निर्विवाद था। उसे पहली बार गरम किया चीन ने।
अमेरिका वैचारिक युद्ध लड़ता रहा, जिसकी परिणति सोवियत संघ के विखंडन में हुई। भारत के प्रति चीन की भावनाओं को समझने के लिए कुछ ऐतिहासिक घटनाएं हमारे स्मृति पटल पर सदैव बनी रहनी चाहिए। 1962 में भारत पर हमले से पहले माओ ने कहा, 'भारत को ऐसा झन्नाटेदार झापड़ मारो कि कभी भूल न पाए।' नवंबर 1973 में माओ ने किसिंजर से कहा, 'भारत ने आजादी जीती नहीं। अगर वह ब्रिटेन से नत्थी न करे, तो सोवियत संघ से करेगा और अब तो उसकी आधी से ज्यादा अर्थव्यवस्था अमेरिका पर निर्भर रहती है।'
बाद में रिचर्ड निक्सन ने पड़ोसियों के प्रति चीन के रुख को इस तरह रखा, 'रूसियों से वे नफरत करते हैं, जापानियों से डरते हैं और भारत को हिकारत से देखते हैं।' माओ ने 1974 में इस हिकारत को एक कविता में इस तरह व्यक्त किया, 'अमेरिका बाघ है, ब्रिटेन शेर है, सोवियत संघ भालू है, मुस्लिम देश चांद हैं, समृद्ध पश्चिम सूर्य है और भारत गाय। अगर मालिक उसे चारा-पानी न दे, तो वह भूखों मर जाए। गाय या तो खाने के काम आती है या सवारी के। फिर भी इस गाय की महत्वाकांक्षा बड़ी हो सकती है।'
हिकारत के साथ-साथ वह मनोवैज्ञानिक युद्ध भी लड़ता है। चीन से तनाव होने पर उसके और समुद्र से भी अधिक गहरी दोस्ती वाले पाकिस्तान की युगलबंदी दिलचस्प होती है। इस समय चल रहे तनाव के बीच पाकिस्तानी प्रेस ने कई बार 1962 का जिक्र किया। ऐसे मौकों पर पाकिस्तान के विशेषज्ञों के बयान आभास कराते हैं कि वे ब्रिगेडियर एस.के. मलिक की द कुरानिक कंसेप्ट ऑफ वार पढ़कर आ रहे हैं।
लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता से एक दिन पहले साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट 'ने हांगकांग स्थित एक सैन्य विशेषज्ञ के हवाले से बताया कि चीन ने तिब्बती सैनिक क्षेत्र में (यह लद्दाख के आगे है) रासायनिक, परमाणु और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के हथियार तैनात कर दिए हैं।'
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रेस कई बार लिख चुका है कि चीन चाहे तो भारत के बीस टुकड़े कर दे। चाऊ एन लाइ ने यही बात दूसरे शब्दों में इस तरह कही थी,'अगर पूरा भारतीय उप महाद्वीप एक होता, तो भी उथल-पुथल चल रही होती। भारत वर्चस्व कायम ही नहीं कर सकता। वह तो हमारा दर्शन है।'
दोकलम में 72 दिन गतिरोध चला था। बुनियादी फर्क यह है कि दोकलम में भूटान की भूमि पर चीनी सेना के कब्जे को विफल करने के लिए भारत आगे बढ़ा था। इस बार वह सीधे हमारी जमीन पर आ बैठा है। बगैर किसी भी समझौते के चीनी सैनिकों की वापसी की अब गुंजाइश नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दर्शन से प्रेरित और निर्देशित, भारी-भरकम बहुमत वाली मोदी सरकार के लिए तो रत्ती भर भी मुमकिन नहीं है। 1962 में पराभूत राष्ट्र की संसद को सर्वसम्मत से प्रस्ताव पास करना पड़ा था कि चीन के कब्जे से एक-एक इंच भूमि मुक्त कराई जाएगी।
एलएसी पर संकट से उस प्रस्ताव का हर शब्द कानों में पिघले हुए सीसे की तरह टपकने लगता है। चीन की नवीनतम हमलावर हरकत का लाजमी असर यह होना तय है कि भारत को अनेक आर्थिक परेशानियों के बीच लगातार चौकस रहना पड़ेगा। चीन को पक्का भरोसा होगा कि वह 1962 को दोहरा नहीं सकता, तो वह एलएसी पर शांति बहाली में जरूर रुचि लेगा। वह ड्रा होने वाली किसी जंग में नहीं पड़ना चाहेगा। लंबे समय तक शांति के लिए भारत को हर सामरिक-कूटनीतिक कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा।