अब एम के स्टालिन द्रमुक के आधिकारिक अध्यक्ष बन गए हैं। हालांकि वह अपने पिता और पार्टी सुप्रीमो एम करुणानिधि के 2016 में बीमार होने के बाद से ही पार्टी के फैसले लेने लगे थे, जबकि वह सिर्फ कार्यकारी अध्यक्ष थे। करुणानिधि की मृत्यु के इक्कीस दिन बाद 28 अगस्त बुधवार को उन्हें द्रमुक के अध्यक्ष पद के लिए निर्विरोध चुन लिया गया, क्योंकि इस शीर्ष पद के लिए उनके खिलाफ कोई भी उम्मीदवार मैदान में नहीं था। इससे पहले सभी जिला प्रमुखों और वरिष्ठ नेताओं ने अध्यक्ष पद के लिए स्टालिन के नाम का प्रस्ताव रखा और इस तरह उनका राज्याभिषेक आसानी से हो गया।
हालांकि शीर्ष पद पर स्टालिन के पदस्थापन को लेकर पार्टी में निश्चित रूप से कोई विद्रोह नहीं था, लेकिन उनके अपने ही परिवार के भीतर तीखा विरोध था, क्योंकि उनके बड़े भाई एम के अलागिरी ने खुलेआम विद्रोह का झंडा उठा रखा था। करुणानिधि के निधन के कुछ ही दिनों बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री और द्रमुक के दक्षिणी क्षेत्र के बर्खास्त संगठन सचिव अलागिरी मरीना पर अपने पिता की समाधि पर गए और स्टालिन के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।
आगामी पांच सितंबर को अलागिरी करुणानिधि की समाधि की ओर एक रैली आयोजित करेंगे, जिसमें उनके लगभग एक लाख समर्थक भागीदारी करेंगे। अपने पिता की समाधि पर विरोध प्रदर्शन की शुरुआत करने के बाद स्टालिन को निशाना बनाने के लिए रणनीति बनाने और कार्ययोजना तैयार करने के लिए मदुरई का यह कद्दावर नेता अपने समर्थकों के साथ एक के बाद एक बैठकें कर रहा है।
तो अलागिरी की शिकायत क्या है? वह कहते हैं, 'पार्टी में पद बेचे जा रहे हैं। कई नेता रजनीकांत की लॉन्च होने वाली पार्टी में जाने के लिए उनके संपर्क में हैं। अगर यह सब जारी रहा, तो पार्टी नष्ट हो जाएगी। हम करुणानिधि के असली अनुयायी हैं और हम पार्टी को बचाना चाहते हैं। मेरे पिता के सभी निष्ठावान नेता मेरे साथ हैं।' अलागिरी के खेमे ने आरोप लगाया कि द्रमुक के कुछ नेता, जो स्टालिन को परामर्श देते हैं, वे उन्हें गुमराह कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि अलागिरी के पार्टी में पुनः प्रवेश से उनके लिए चीजें कठिन हो जाएंगी। अलागिरी के उन करीबी लोगों के मुताबिक, यही लोग पार्टी को बर्बाद कर रहे हैं और स्टालिन को नियंत्रित करते हैं। हालांकि, स्टालिन खेमे का रुख स्थिर और स्पष्ट है। उनके मुताबिक, पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण अलागिरी को करुणानिधि द्वारा निष्काषित किया गया था। उन्हें फिर से द्रमुक में शामिल करने का सवाल ही नहीं है। हम कलाइग्नर (करुणानिधि) के बेटे होने के नाते उनका सम्मान करते हैं, लेकिन पार्टी हित की बात आती है, तो परिवार पीछे रह जाता है। कहा जा रहा है कि अलागिरी अपने और अपने बेटे दयानिधि अलागिरी के लिए पार्टी और उसके संगठनों में अच्छा पद चाहते हैं, जिसे स्टालिन ने खारिज कर दिया है। पार्टी और परिवार के कुछ वरिष्ठ सदस्यों ने दोनों के बीच मेल-मिलाप कराने की भी कोशिश की, लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला।
हाल ही में पार्टी सदस्यों को लिखे एक पत्र में स्टालिन ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह किसी भी बाधा का सामना करने के लिए तैयार हैं। कहा जाता है कि यह टिप्पणी अलागिरी को लक्ष्य करके लिखी गई थी। लेकिन उनके बड़े भाई का कहना है कि अगर उन्हें और उनके समर्थकों को पार्टी में फिर से शामिल नहीं किया गया, तो द्रमुक के लिए आगे मुश्किल होगी। हालांकि इस समय एक भी जिला सचिव या पूर्व मंत्री के विधायक अलागिरी के समर्थन में नहीं है, यह डर है कि वह लोकसभा चुनाव में द्रमुक की संभावनाओं को खत्म कर देंगे, खासकर तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों में, जहां उसकी मजबूत पकड़ है।
अलागिरी के अलावा भी द्रमुक के अध्यक्ष के रूप में स्टालिन के समक्ष कई अन्य चुनौतियां हैं। बेशक उन्हें खुलकर काम करने का मौका मिल सकता है, पर उनके कदमों को अब न केवल उनकी पार्टी के सदस्यों, बल्कि उनके आलोचकों, विरोधियों और आम लोगों द्वारा भी आंका जाएगा। एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद द्रमुक सत्ता से बाहर है और इसलिए यह स्टालिन की जिम्मेदारी बनती है कि वह पार्टी को सत्ता में लाएं, कुछ ऐसा करें, जो कार्यकर्ताओं को उत्साहित करे और संगठन के शानदार भविष्य का मार्ग प्रशस्त करें। पार्टी की आंतरिक चुनौतियों के अलावा उन्हें रजनीकांत से मिलने वाली कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अपनी पार्टी बनाने के लिए तैयार रजनीकांत और शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण की तमिलनाडु की राजनीति में धीरे-धीरे ही सही, मजबूत पकड़ बनती जा रही है। स्टालिन के लिए खतरा पैदा करने वालों में अन्नाद्रमुक के मुख्यमंत्री पलानीस्वामी और उप मुख्यमंत्री पनीर सेलवम भी हैं। इसके अलावा भाजपा भी तमिलनाडु में खुद को मजबूत बनाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। ऐसा आरोप है कि यह राष्ट्रीय पार्टी अन्नाद्रमुक और द्रमुक जैसी द्रविड़ पार्टियों को कमजोर करना चाहती है, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने इसका खंडन किया है।
भले ही स्टालिन अपने पिता की तरह वाक्पटु नहीं हैं, पर वह सक्षम प्रशासक हैं। वह चेन्नई के मेयर थे और तमिलनाडु के उप मुख्यमंत्री भी रहे हैं। कार्यकर्ताओं के बीच भी वह काफी लोकप्रिय हैं। वह स्पष्ट और खरा बोलने वाले व्यक्ति हैं, हालांकि कभी-कभी गलत लोकोक्तियों के प्रयोग के कारण उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल भी होना पड़ा है। उन्होंने कई बार पूरे तमिलनाडु का दौरा किया है और राज्य के चप्पे-चप्पे को जानते हैं। उन्हें पिता की राजनीतिक संस्कृति विरासत में मिली है, जिसमें बिना व्यक्तिगत दुश्मनी के विरोधियों के साथ भी आगे बढ़ने की संस्कृति है। इसलिए पार्टी कार्यकर्ताओं को जरा भी संदेह नहीं है कि वह अपने पिता की तरह ही पार्टी का संचालन करेंगे। और इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि स्टालिन परिश्रमी कार्यकर्ता हैं। लेकिन आने वाले दिनों में उनसे बहुत ज्यादा स्मार्ट कार्यों की उम्मीद रहेगी।