कई महीनों से गूंज रहे नारों-’गो गोता गो’ का, जिसमें मांग की जा रही थी कि राष्ट्रपति गोतबाया इस्तीफा दे दें, कोई असर नहीं हुआ। वर्ष 2009 में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के बीच हजारों अल्पसंख्यक तमिलों की हत्या के लिए जिम्मेदार गोतबाया ने अभी प्रदर्शन कर रहे लोगों की मांग पर ध्यान नहीं दिया। वह राजपक्षे परिवार को बचाने में व्यस्त थे। जब संकट शुरू हुआ, तो कम से कम चार अन्य राजपक्षे और कुछ अन्य करीबी रिश्तेदार प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के नेतृत्व वाली सरकार में थे। राजपक्षे पिछले चुनाव में मिले भारी जनादेश के प्रति आश्वस्त थे। वास्तव में श्रीलंका ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया ने ऐसे जनादेशों को अभिशाप बनते देखा है और जिसने मतदाताओं को नाराज किया है। व्यापक जनादेश पाने वाले नेता पार्टी कार्यकर्ताओं, उदार नौकरशाही, सहायक न्यायपालिका और पालतू मीडिया के समर्थन से इसका दुरुपयोग करते हैं।
श्रीलंका के मामले में राजपक्षे बंधुओं ने यह नहीं सोचा था कि उनका पारिवारिक शासन और आर्थिक कुप्रबंधन व्यापक जनादेश को व्यापक विरोध प्रदर्शन में तब्दील कर देगा। हर जगह ऐसे जनादेश अक्सर बहुसंख्यकवादी राजनीतिक एजेंडे पर आधारित होते हैं। केवल राजपक्षे ही नहीं, स्वतंत्रता के बाद से श्रीलंका पर शासन करने वाले अधिकांश पारिवारिक कुलीन वर्गों ने बहुसंख्यकवादी एजेंडे को आगे बढ़ाया है। बहुसंख्यक 70 प्रतिशत सिंहलियों के लिए, उन्होंने 17 प्रतिशत तमिलों और नौ प्रतिशत मुसलमानों के साथ भेदभाव किया है। चाहे कोई माने या नहीं, धर्म ने अपनी भूमिका निभाई है, क्योंकि सिंहली बौद्ध हैं।
इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अन्य देशों की तरह, कोविड महामारी ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने में भूमिका निभाई है। श्रीलंका एक छोटी अर्थव्यवस्था है, जिसका प्रबंधन इसके कमजोर संस्थानों द्वारा होता है। राजपक्षे ने फालतू खर्च और बड़ी परियोजनाओं में कटौती नहीं की। यहां तक कि उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ (चाय, पर्यटन एवं वस्त्र उद्योग) भी महामारी के कारण टूट गई। गलत समय पर कृषि क्षेत्र में सुधारों को लागू किया गया, और उर्वरक आयात में कटौती की गई थी। राजपक्षे परिवार इनमें से सभी नहीं, तो बदहाली के अनेक कारणों के लिए जिम्मेदार था। और व्यापक जनादेश को पारिवारिक शासन में बदलने पर यह एक और दुखद टिप्पणी है।
इस परिवार का शासन खत्म हो जाता है, तो आगे श्रीलंका में क्या होगा? राष्ट्रपति गोतबाया और प्रधानमंत्री रानिल विक्रममसिंघे ने पहले ही संकेत दे दिया है कि वे पद छोड़ देंगे। छह बार के प्रधानमंत्री को अवसरवादी राजनीतिक गठजोड़ ने एक बार फिर धोखा दिया है, जिसके लिए श्रीलंका कुख्यात है। क्या इससे सत्ता में शून्य पैदा होगा? ऐसी स्थिति श्रीलंका को अराजकता में डुबो सकती है। सौभाग्य से, संसद के अध्यक्ष महिंदा यापा अभयवर्धने ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाने की पहल की है। विक्रमसिंघे ने कहा है कि एक बार सर्वदलीय सरकार बन जाने के बाद वह प्रधानमंत्री पद छोड़ने के लिए तैयार हो जाएंगे। जब सत्ताधारी पार्टी के पास भारी बहुमत है, तब श्रीलंका में एक सर्वदलीय सरकार बनना उसके लोकतंत्र की स्थिति को दर्शाता है।
एक बड़े पड़ोसी के रूप में भारत को श्रीलंका के इस संकट का संज्ञान लेना ही होगा। राजपक्षे के साथ इसके संबंध बहुत गर्मजोशी वाले नहीं रहे हैं। लेकिन यह रिश्ते की परीक्षा लेने का समय नहीं है। पिछले कुछ महीनों में, भारत ने सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर श्रीलंका को भोजन, उर्वरक और ईंधन की आपूर्ति की है। भारत अपनी प्रतिक्रिया देने में सतर्क रहा है, जो उचित ही है। जरूरत के अनुसार यह और सहायता देगा। कोलंबो धन के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और खाद्य आपूर्ति के लिए विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) से संपर्क कर रहा है। बहुत संभावना है कि डब्ल्यूएफपी भारत के माध्यम से रसद की आपूर्ति करे। श्रीलंका के घटनाक्रम का भारत पर राजनीतिक असर भी पड़ेगा। तमिलनाडु पुराने घावों को भूलकर मोदी सरकार से अपील कर सकता है कि वह श्रीलंकाई लोगों को राहत प्रदान करे, जिसमें तमिल भी शामिल हैं।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसने एक बहस छेड़ दी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की इस टिप्पणी ने, कि श्रीलंका की स्थिति भारत की तरह है, सरकार और भाजपा को आक्रोशपूर्ण प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाया है। उनकी प्रतिक्रिया है कि श्रीलंका बहुत छोटा देश है और आर्थिक रूप से कमजोर है, इसलिए उसकी तुलना भारत ने नहीं की जा सकती। हमेशा की तरह राहुल गांधी सोशल मीडिया पर ट्रोल हो रहे हैं। हालांकि इस तथ्य के दो पहलू हैं। पहला कि भारतीय अर्थव्यवस्था भी तनाव से गुजर रही है, लेकिन श्रीलंका की तरह इसके ढहने की आशंका नहीं है। अर्थव्यवस्था का आकार उतना मायने नहीं रखता, जितना उसका सही प्रबंधन। लेकिन राहुल गांधी की टिप्पणी में अंतर्निहित गहरे संदेश राजनीतिक हंै, जिसे न तो सरकार और न ही राहुल गांधी पर हमलावर ट्रोल समझने या मानने के लिए तैयार हैं।
श्रीलंका और भारत, दोनों ने अपने-अपने बहुसंख्यक एजेंडे को आगे बढ़ाया है। देश और विदेश में आलोचकों की नजर में व्यापक रूप से कथित रूप से भारत में मुसलमान और श्रीलंका में तमिल और मुसलमान निशाने पर हैं। मूल संदेश यह है कि एक बहुसंख्यक राजनीतिक एजेंडा, लोगों को विभाजित करते हुए, किसी न किसी स्तर पर अनुत्पादक हो सकता है, और अर्थव्यवस्था संकट में घिर जाती है।