पिछले शुक्रवार श्रीलंका एक बड़े संकट में घिर गया, जब राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर दिया, और उन महिंदा राजपक्षे को शपथ दिला दी, जिन्हें खुद उन्होंने 2015 के राष्ट्रपति चुनाव में पराजित किया था। सिरीसेना ने मध्य नवंबर तक संसद को भी निलंबित कर दिया। विक्रमसिंघे और स्पीकर कारु जयसूर्या का कहना है कि संसद ही मौजूदा प्रधानमंत्री को हटा सकती है।
इस घटनाक्रम से भारत और चीन के साथ श्रीलंका के बदलते रिश्तों को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। यह सर्वविदित है कि राष्ट्रपति के रूप में राजपक्षे ने देश में चीन को काफी छूट दी। लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) को कुचलने के लिए चीनी हथियारों के इस्तेमाल के बाद राजपक्षे ने हम्बनटोटा बंदरगाह, मटाला इंटरनेशनल एयरपोर्ट और दक्षिण श्रीलंका में स्टेडियम जैसी भव्य परियोजनाओं के लिए चीनी कर्ज की मंजूरी देकर देश में उसकी पकड़ मजबूत होने दी। अक्तूबर, 2014 में कोलंबो बंदरगाह में एक चीनी पनडुब्बी की मौजूदगी खतरे की घंटी जैसी थी, जिसका भारत ने विरोध किया था। 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते के मुताबिक, दोनों देशों ने प्रतिज्ञा की है कि वे अपने क्षेत्रों में एक-दूसरे की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए हानिकारक गतिविधियों की अनुमति नहीं देंगे। सिरीसेना सरकार ने वर्ष 2017 में भले ही एक और पनडुब्बी को देश में आने से रोक दिया, लेकिन वह हम्बनटोटा मुद्दे से निपटने में असमर्थ थी और उसे चीन को 99 साल के पट्टे पर देने के लिए मजबूर थी। यहां तक कि जब 30 करोड़ डॉलर की आवासीय परियोजना चीन से लेकर भारत को दिया गया, तब भी चीन की पैठ वहां गहरे तक थी और वह कई बड़ी परियोजनाएं चीन को देने के लिए प्रतिबद्ध थी।
लेकिन शुक्रवार की कार्रवाई के जरिये सिरीसेना ने उस गठबंधन को तोड़ दिया, जो देश में शासन कर रहा था और जिसकी बदौलत वह राष्ट्रपति बने थे। इस गठबंधन में विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) शामिल थी, जिसने आश्चर्यजनक कदम उठाते हुए 2015 के राष्ट्रपति चुनाव में राजपक्षे सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सिरीसेना को विपक्ष के साझा उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया। सिरीसेना ने दो बार राष्ट्रपति रह चुके राजपक्षे के खिलाफ चुनाव जीत कर पर्यवेक्षकों को हैरान कर दिया था।
बाद के संसदीय चुनाव में यूएनपी गठबंधन ने चुनाव जीते, हालांकि उसे संसद में बहुमत नहीं मिला। मगर वह यूनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम एलायंस (यूपीएफए) के सिरीसेना गुट की मदद से राष्ट्रीय सरकार बनाने के लिए सहमत हो गई। अभी निलंबित हुई संसद में सत्ता पक्ष के सदस्यों की कुल संख्या 140 है, जिनमें से 106 यूएनपी-एसएलएफपी से संबंधित हैं, 33 यूपीएफए (सिरीसेना गुट) के और एक श्रीलंका मुस्लिम एलायंस के हैं। संसद में विपक्षी सदस्यों की संख्या 85 है, जिनमें से 62 सीटें यूपीएफए (राजपक्षे) के पास हैं और तमिल मुस्लिम एलायंस के 16 तथा अन्य की एक सीट है।
जब तक दल-बदल नहीं होता, यूपीएफए के दोनों धड़े और उनके सहयोगी मिलकर बहुमत नहीं साबित कर सकते। संभवतः संसद को निलंबित करने के पीछे जोड़-तोड़ के लिए समय देने का ही इरादा है, लेकिन जिस तरह से संसद बंटी हुई है, यह स्पष्ट है कि कोई भी परिणाम अस्थिर होगा और संभवतः ताजा चुनाव कराना ही एकमात्र विकल्प है। इससे राजपक्षे को फायदा होगा, जिनकी पार्टी एसएलपीपी को फरवरी में हुए स्थानीय निकाय के चुनाव में 44.65 फीसदी वोट मिले थे, जबकि यूएनपी को मात्र 32.63 फीसदी। सिरीसेना के यूपीएफए को मात्र 8.94 फीसदी वोट ही मिले थे। यूएनपी और यूपीएफए के बीच संबंध हाल के दिनों में तब तनावग्रस्त हो गए थे, जब सिरीसेना ने अर्थव्यवस्था के खराब प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को दोषी ठहराया था। बदले में यूएनपी के कई नेताओं ने राष्ट्रपति की आलोचना की। सिरीसेना को 2015 में मिली जीत में एक दशक से काबिज राजपक्षे परिवार के सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के खात्मे और बेहतर प्रशासन की चाहत के साथ ही विपक्ष की चालाक रणनीति ने भी अहम भूमिका निभाई।
हालांकि सिरीसेना-विक्रमसिंघे निर्णायक रूप से मिलकर काम करने में विफल रहे। स्थानीय निकाय के चुनाव में दोनों खुलकर लड़ रहे थे। श्रीलंका की अर्थव्यवस्था की विकास दर गिर रही है और इसका कर्ज इतना अधिक है कि विदेशी निवेशकों को डर लगता है। हाल ही में, सिरीसेना ने अपने खिलाफ हत्या की कथित साजिश की जांच न करने के लिए विक्रमसिंघे की आलोचना की। सिरीसेना ने भारतीय खुफिया एजेंसी पर उसमें शामिल होने का आरोप लगाया था, लेकिन फिर भारत और श्रीलंका दोनों ने उससे इनकार कर दिया। श्रीलंका में यह सत्ता संघर्ष ऐसे संवेदनशील समय में हुआ है, जब देश को अंतरराष्ट्रीय मुश्किल परिस्थितियों से जूझने के साथ-साथ राजपक्षे के राष्ट्रपति काल में चीन से लिए गए कर्जों का परिणाम भुगतना पड़ रहा है। श्रीलंकाई संविधान का 19वां संशोधन राजपक्षे को एक और राष्ट्रपति कार्यकाल देने से इनकार करता है, लेकिन लोग उनसे उम्मीद करते हैं कि वे अपने भाई गोटाबाया राजपक्षे को आगे बढ़ाएं, जो कभी ताकतवर रक्षा मंत्री थे। निश्चित रूप से वह एक बार और संविधान में संशोधन करने की कोशिश कर सकते हैं और सत्ता संतुलन का झुकाव प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर कर सकते हैं।
पिछले तीन वर्षों का अनुभव बताता है कि श्रीलंका का राजनीतिक संकट उतना ही गहरा है, जितना उसका आर्थिक संकट। लेकिन कुछ ऐसी चीजें हैं, जिसके के लिए देश के लोगों को काम करने की जरूरत है। भारत और चीन, दोनों की श्रीलंका में गहरी दिलचस्पी है, और उनके लिए बेहतर यही है कि श्रीलंका के आंतरिक राजनीतिक संकट में शामिल हुए बिना प्रतिस्पर्धा करें। श्रीलंका और भारत के रिश्ते संस्कृति और व्यापार के मामले में बेहद करीबी हैं। उदाहरण के लिए कोलंबो बंदरगाह के ट्रांस-शिपमेंट का 70 प्रतिशत भारतीय यातायात से संबंधित है। राजपक्षे को पता है कि नई दिल्ली की सीमाएं हैं और उन्हें सलाह दी जाएगी कि वे उसे पार न करें।
-लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं।