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अगले चुनाव की व्यूह रचना में सपा

Tue, 18 Sep 2012 02:43 PM IST
कृपाशंकर चौबे
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कोलकाता में पिछले दिनों संपन्न हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने स्पष्ट कर दिया कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद ही तीसरे मोरचे के गठन के बारे में निर्णय लिया जाएगा। तब तक मुलायम सिंह की रणनीति सभी गैर भाजपा तथा गैर कांग्रेस दलों से संबंध बनाकर चलते हुए तमाम संभावनाओं को जिंदा रखने की है।
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बंगाल का ही मामला लें, तो सपा यहां वाम मोरचा तथा तृणमूल, दोनों से बेहतर संबंध बनाकर चल रही है। अगर हाल के दिनों में उसने तृणमूल से नजदीकी बनाई, तो कोलकाता में उसने साफ-साफ यह भी कहा कि उसकी नजदीकी वाम मोरचे से ज्यादा है। तृणमूल से दोस्ती गांठकर वह वाम मोरचे से इसलिए भी दूरी नहीं बना सकती, क्योंकि अगले चुनाव में बंगाल और केरल में वाम मोरचे का प्रदर्शन अच्छा हो सकता है।

सपा की कुल कोशिश दरअसल अगले चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 में से कम से कम 60 सीटों पर जीत हासिल करने की है, क्योंकि तब केंद्र की सत्ता की चाबी उसके पास आने की उम्मीद बढ़ जाएगी। मुलायम यह स्वप्न इसलिए भी देख पा रहे हैं, क्योंकि भाजपा अपनी अंदरूनी कलह और कांग्रेस नित नए घोटालों से उबर नहीं पा रही। ऐसे में सपा के लिए सक्रिय होने का यही उपयुक्त समय है। इसीलिए वह यह संदेश दे रही है कि वह घोषणापत्र में किए गए वायदों को पूरा करने के प्रति गंभीर है।
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पिछले दिनों राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बेरोजगारी भत्ता बांटने की शुरुआत कर उसी का संकेत दिया। अब कन्या विद्या धन और फिर लैपटॉप की बारी है। कोलकाता में ही सपा ने यह मुद्दा उठाया कि उत्तर प्रदेश की तरह दूसरे राज्यों में भी बेरोजगारी भत्ता दिया जाए। दूसरे प्रदेशों में जनाधार बढ़ाने के मकसद से पार्टी ने यह चारा फेंका है। जाहिर है, दूसरे राज्यों में उसकी मौजूदगी जितनी बढ़ेगी, अगले चुनाव के बाद केंद्र में उसकी स्वीकार्यता और संभावना उतनी ही अधिक होगी।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश से बाहर भी सपा को पहले भी कुछ न कुछ सफलता मिलती रही है। वर्ष 2005 में कर्नाटक की एक संसदीय सीट पर सपा को विजय मिली थी। 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा को सात सीटें मिली थीं। इस समय सपा के महाराष्ट्र में तीन, बिहार में दो और पश्चिम बंगाल में एक विधायक हैं। पश्चिम बंगाल में किरणमय नंद ने अपने दल सोशलिस्ट पार्टी का सपा में विलय कर दिया है।

सपा के लिए यह समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसकी स्थापना के दो दशक पूरे हो रहे हैं। दो दशकों की इस यात्रा में सबसे बड़ी कामयाबी उसे इस साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 224 सीटों पर विजय के रूप में मिली। इसी जीत को सपा अगले लोकसभा चुनाव में भी भुनाना चाहती है। मुलायम सिंह यादव इस समय इसी उम्मीद में यूपीए सरकार के संकटमोचक बने हुए हैं, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर कांग्रेस भी केंद्र में उनकी सरकार बनाने और चलाने में मदद करे।

यूपीए सरकार पर जब भी संकट आता है, तब कांग्रेस मुलायम सिंह की ही मदद लेती है। कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले को लेकर प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए भाजपा ने जब संसद का सद्यः समाप्त मानसून सत्र चलने नहीं दिया, उस समय भी मुलायम ने अलग राजनीतिक लाइन अख्तियार की। उन्होंने इस मामले की जांच कराने और संसद में चर्चा कराने की मांग को लेकर संसद के द्वार पर धरना दिया। मुलायम की इस राजनीतिक लाइन से कांग्रेस को भले थोड़ी राहत मिली हो, इसे भूलना ठीक नहीं होगा कि मुलायम के धरना कार्यक्रम में आधा दर्जन राजनीतिक दल शरीक हुए।

तो क्या माना जाए कि तीसरे मोरचे की कवायद शुरू हो चुकी है? सपा की मंशा चाहे जो भी हो, इतना तय है कि आगामी चुनाव से पहले वह केंद्र सरकार को अस्थिर करने का कोई काम नहीं करेगी। यह नहीं भूलना चाहिए कि वह भाजपा और कांग्रेस-विरोधियों से कितनी ही निकटता क्यों न जताए, फिलहाल उत्तर प्रदेश की अपनी सरकार को मजबूती से चलने देने के लिए उसे केंद्र के समर्थन और वित्तीय सहयोग की बेहद जरूरत है।
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