कोई कह सकता है कि
पत्ता
पत्ता है
पेड़
पेड़
जो कि पतझड़ में भी खड़ा मिलता है
फिर यह भी कह सकता है कि
भला इसमें पत्ते का क्या दोष?
और पेड़ की भी ऐसी क्या तारीफ?
आखिर तो दोनों ही एक-दूसरे से
अपनी-अपनी मृत्यु तक जुड़े हुए हैं
किंतु ये सब एकदम सामान्य बातें हैं
आप कहीं से एक पेड़ लेकर आएं
आपको लगेगा कि
आप महज एक पेड़ लेकर आए हैं
जिसे आप कहीं पर भी रोप या रख देंगे
किंतु कहीं से आप
महज एक अदद पत्ता लेकर आएं
आपको लगेगा कि इस पत्ते को संभालते हुए
जैसे आप स्वयं
किसी किताब
किसी आले
किसी गहरे दिल की स्मृतियों और
सपनों का पेड़ हो गए हैं
ऊंचा और झक्क हरा-भरा
बल्कि
देर तक आप उसकी खट्टी-मीठी औ भीनी सुगंध में
डूबे रहेंगे
मेरा मतलब यह कतई नहीं है कि
पेड़ के बिना पत्ता कुछ नहीं है या
बिना पत्ते का पेड़ भी क्या हुआ?
मेरा मंतव्य तो इतना भर है कि
यहां एक पेड़ है और
हर कोई उसका
एक न एक पत्ता जरूर।
की संपादक हैं