ऐसा भी होता है, हीरो भी रोता है। कोई चाहे कितना ही दबंग हो, लेकिन कठघरे में खड़ा होता है, तो अंग दब-सा जाता है। वह हीरोगीरी भूल जाता है। तराशी हुई इस्पाती काया थर्रा उठती है, मजबूत दिल कमजोर पड़ जाता है, सिक्स पैक ढीले पड़ जाते हैं, कसी हुई प्लास्टिक भरी त्वचा में सलवटें आ जाती हैं और सुर्खियों के आईने में चमकाई आकर्षक इमेज तड़क जाती है।
हीरो के ऐसे विपरीत काल में छिपी बीमारियां तक बाहर आकर रहम की गुहार लगाने लगती हैं, इस बात की परवाह किए बिना कि हीरो की इमेज का क्या होगा! जिसके जांबाजी के किस्से हम सुनते आए हैं, अचानक उसकी दयालुता के ब्योरे सामने आने लगते हैं, मानो वह जेल में होगा, तो दुखियारों का क्या होगा! एक हीरो उस समय सचमुच कितना असहाय हो जाता है, जब वह कानून की धाराओं से बंधा अदालत के कठघरे में खड़ा होता है। उस कठघरे में, जिसमें वह फिल्मों में कितनी ही बार खड़ा हुआ है और कितनी ही बार कभी अपने डायलॉगों से, कभी अपनी हीरोगीरी के दम पर उससे बाहर आया है। पर वह जब वाकई कानून के कठघरे में खड़ा होता है, तो चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगती हैं। यह पता चलता है कि यह दुनिया उसकी मर्दानगी पर मर मिटने वाली ही नहीं है।
हीरो की दबंगई पर तो कोई शक ही नहीं। वह इतना दबंग है कि जो भी सामने पड़ा, हमेशा बचकर ही निकला। वह बर्ताव में बिल्कुल शेर की मानिंद है और शिकारी उम्दा किस्म का। ऐसा उम्दा कि 15 साल पहले किए शिकार के चर्चे आज तलक सुर्खियों से मिट नहीं सके हैं। उसका मशहूर डायलॉग है कि मैं किसी की नहीं सुनता, अपने आप की भी नहीं सुनता। किसी की न सुनने वाले को एक दिन कीमत तो चुकानी ही पड़ती है, क्योंकि वह गलती कर बैठता है। हर गलती कीमत मांगती है। हर गलती की क्षतिपूर्ति होती है। किसी को जेल के रूप में, तो किसी को बेल के रूप में। हालांकि जेल और बेल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज जेल है, तो कल बेल है।