गुरु विश्वंभर पेड़ के नीचे बनी पीठ पर बैठे पढ़ा रहे थे, तभी पीछे से दो शिष्यों के विवाद में उलझे होने की आवाज आने लगी। गुरुजी ने उन्हें पास बुलाया और कारण पूछा। अजित सेन ने कहा, पूज्यवर, केसवंदन अपनी बात को लेकर अड़ा है और मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है।
केसवंदन ने कहा कि अजित जो कह रहा है, वह गलत है। ऐसा कहकर वे फिर झगड़ने लगे। गुरु ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा, तुम दोनों यहां मेरे पास आ जाओ। अजित, तुम पीठ की बाईं तरफ, और केस, तुम दाईं तरफ खड़े हो जाओ।
इसके बाद गुरु जी ने एक बड़ी-सी प्रतिमा निकाली और पीठ के सामने रख दी। फिर अजित से कहा, तुम बताओ कि यह प्रतिमा किस रंग की है। अजित ने कहा यह सफेद रंग की है। गुरु ने केस से कहा कि तुम बताओ, इस प्रतिमा का क्या रंग है। केसवंदन ने कहा कि यह बिल्कुल काली है। दोनों ही अपनी बात पर दृढ़ और आश्वस्त थे कि उनका जवाब सही है। एक बार फिर वे प्रतिमा के रंग को लेकर बहस करने लगे। गुरु ने उन्हें शांत कराते हुए कहा कि ठहरो, अब तुम दोनों अपने-अपने स्थान बदल लो और फिर बताओ कि प्रतिमा किस रंग की है।
दोनों ने ऐसा ही किया, पर इस बार उनके जवाब भी बदल चुके थे। अजित सेन ने प्रतिमा का रंग काला, तो केसवंदन ने सफेद बताया। अब गुरु विश्वंभर की बारी थी। वह बोले, बच्चो, यह प्रतिमा दो रंगों से बनी है। और जिस तरह यह एक जगह से देखने पर काली और दूसरी जगह से देखने पर सफेद दिखती है, जिंदगी के रंग भी इसी तरह अलग-अलग दिखाई देते हैं। कभी कोई मतभेद हो, तो यह मत समझना कि सामने वाला बिल्कुल गलत है।