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कुएं में समाजवाद

Thu, 12 Feb 2015 09:28 PM IST
पूरन सरमा
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पिछले दिनों एक सुनसान पगडंडी से गुजर रहा था। यकायक किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी। चौंककर इधर-उधर देखा, पर कोई दिखाई नहीं दिया। फिर जिस ओर से आवाज आ रही थी, उस दिशा में चला, तो आवाज एक गहरे अंधे कुएं में से आ रही थी। मैंने कुएं में झांका, तो न पानी था, न कुछ दिखाई देता था। गहरा अंधेरा छाया हुआ था। मैं सहम गया। डरते-डरते ही मैंने आवाज लगाई, कौन है?
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कुएं से कराहने की धीमी आवाज आई। कोई था। मैंने पूछा, कौन हो तुम? क्या हुआ है तुम्हें? कुएं के भीतर कैसे गिर पड़े?
वह बोला, इस बार मुझे बाहर निकाल दो इस अंधे कुएं से। तुम्हारा एहसास जीवन भर नहीं भूलूंगा। वे लोग मुझे यहां डाल गए हैं।तब से यहीं पड़ा हूं।
कौन लोग, मेरे आश्चर्य का ठिकाना न था।
वे चार लोग थे। धोती-कुर्ता और टोपी लगाए थे। मुझे पता नहीं, वे थे कौन, पर लोग उन्हें नेताजी कहा करते थे। जब उन्हें पता चला कि नेहरू के समय से जिस समाजवाद का उल्लेख होता है, वह मैं हूं, तो वे सकपका गए। एक दिन धोखे से मुझे घर से निकाल ले आए और इस कुएं में फेंक दिया। तब से यहीं पड़ा हूं।

लेकिन तुमने उनका क्या नुकसान किया था? मैंने पूछा।
तुम समझे नहीं। मैं उनके सामने रहूं, तो उनकी तमाम असलियत सामने नहीं आ जाएगी?
क्या बकते हो? अभी-अभी चुनाव हुए हैं। उसमें तमाम नेताओं ने तुम्हारा उल्लेख किया। सरकार ने भी फिर नारा दिया है कि वह देश में समाजवाद लाकर रहेगी। गरीब-गरीब दशकों से तुम्हारी बाट जोह रहे हैं। और तुम हो कि यहां अंधे कुएं में पड़े हो।
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मैं फिर कहता हूं भले आदमी। तुम मुझे बाहर निकालो, वर्ना सरकार पहले की तरह जनता को बेवकूफ बनाती रहेगी। यदि तुम मुझे निकाल सको, तो मैं सरकारों की कलई जनता के सामने खोल सकता हूं। इसमें तुम्हारा भी भला होगा। तुम्हें कुछ पब्लिसिटी मिल जाएगी।

मैं अचानक सकपका गया, जब सरकार के लोग ही तुम्हें इस कुएं में डाल गए हैं, तो मैं तुम्हें निकाल कर देशद्रोह का आरोप अपने माथे क्यों लूं? आज के दौर में ऐसी बहादुरी अच्छी नहीं। तुम कुएं में ही ठीक हो मेरे दोस्त।
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