यह तो इस तरह का सिर्फ एक उदाहरण है। हम इसे रोज देख रहे हैं। यदि आप किसी लेख या उत्पाद के लिए गूगल करें, तो कुछ सेकंड के भीतर ही गूगल के साथ ही ऐसे अन्य प्लेटफार्म पर आपके सामने उसी तरह के उत्पादों के ढेरों विज्ञापन आने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से यह विभिन्न प्लेटफार्म पर ट्रेकिंग या डाटा शेयरिंग का ही रूप है और यह पूरी तरह से निजता पर हमला है तथा बिना पूर्व सूचना या सहमति के पीछा करना या निगरानी करना है। निजता नीति के नाम पर किसी व्यक्ति को सौ पेज का दस्तावेज सौंपना और सारा बोझ उस पर मढ़ देना कि उसने यह नीति स्वीकार की है, सरासर अन्याय है, क्योंकि उपभोक्ताओं में आया, बाई, चौकीदार और ड्राइवर जैसे लोग भी होते हैं, जो शायद इन दस्तावेजों को पढ़ने और समझने में किसी वकील जैसे योग्य न हों। इसे सहमति नहीं कहा जा सकता। व्हाट्सएप के मुताबिक भारत में उपभोक्ताओं के पास फेसबुक या समूह के दूसरे प्लेटफार्म के साथ अपने डाटा साझा करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा।
हालांकि यूरोप के उपभोक्ताओं के लिए उस एप की डाटा शेयरिंग नीतियों में बदलाव नहीं होगा। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या भारतीय उपभोक्ताओं की निजता यूरोपीय उपभोक्ताओं की निजता से कम महत्वपूर्ण है। आखिर जब निजता और डाटा के संरक्षण की बात आती है, तो भारतीय उपभोक्ताओं को हलके में क्यों लिया जाता है? भारतीय उपभोक्ताओं को अधिकार है कि उनके साथ उनके वैश्विक समकक्षों जैसा व्यवहार किया जाए और भारत सरकार को चाहिए कि वह ग्लोबल टेक कंपनियों को इस बारे में स्पष्ट संदेश दे। सरकार को चाहिए कि वह डाटा संरक्षण विधेयक के जरिये नागरिकों की सुरक्षा करे या देश की सीमाओं से डाटा बाहर ले जाने वाली टेक कंपनियों के लिए तत्काल कोई निर्देश जारी करे। व्हाट्सएप अब भारत में भुगतान प्रणाली में भी प्रवेश कर रहा है।
भारतीय उपभोक्ताओं के भुगतान संबंधी डाटा को व्हाट्सएप समूह की दूसरी कंपनियों से लक्षित विज्ञापनों के लिए साझा करना स्पष्ट रूप से नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। एनपीसीआई के दिशा-निर्देशों के मुताबिक जब तक कि कानून द्वारा वांछित न हो या फिर नियामक/वैधानिक प्राधिकार द्वारा मांगा न जाए, किसी भी तीसरे पक्ष के साथ डाटा या सूचना का साझा नहीं किया जा सकता। ऐसे अपवाद मामलों में जहां डाटा/सूचना अनुकूल कानून के तहत साझा करना या किसी नियामक/वैधानिक प्राधिकार के समक्ष प्रस्तुत करना जरूरी हो और ऐसे कानून के तहत संबंधित नियामक/वैधानिक प्राधिकार द्वारा मंजूरी दी गई हो, तब पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर (पीएसपी) को इसके बारे में एनपीसीआई और बैंक को पूर्व लिखित सूचना देनी होगी। इसी के अनुरूप यूपीआई के जरिये भुगतान की सुविधा प्रदान करने वाले एप को एनपीसीआई के दिशा-निर्देशों के मुताबिक किसी तीसरे पक्ष के साथ डाटा साझा करने की अनुमति नहीं है। एनपीसीआई के मुताबिक, पीएसपी बैंक यह सुनिश्चित करेगा कि तीसरे पक्ष के प्रदाता एप को व्यक्तिगत यूपीए लेनदेन डाटा को किसी तीसरे पक्ष के साथ साझा करने के लिए एनपीसीआई और पीएसपी बैंक से विशेष अनुमति लेनी होगी।'
हालांकि बड़ी तकनीकी कंपनियां अपने विज्ञापन कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए उपभोक्ता की निजता से समझौता करती हैं, जो कि भारतीय उपभोक्ताओं के लिए नुकसानदेह है। भारतीय उपभोक्ताओं के डाटा को किसी को बेचना निजता संबंधी सारे दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है और इसे किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए। मैंने डाटा शेयरिंग के लिए मुफ्त बनाम भुगतान संबंधी कुछ तर्क देखे हैं। दोनों ही मामलों में स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत सहमति के बिना डाटा साझा नहीं किया जा सकता। यह उक्ति कि, 'सेवा जब मुफ्त हो तो आप हैं उत्पाद', हमें मजबूर करती है कि हम स्वीकार करें कि यदि कोई चीज हम मुफ्त में इस्तेमाल कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हमने मुफ्त सेवा प्रदाता को अपनी निजी सूचना के इस्तेमाल की इजाजत दी है। यह एक त्रुटिपूर्ण विचार प्रक्रिया है और यह इस बात का भी उदाहरण है कि हमारे दिमाग को कैसे संचालित किया जाता है। नहाने के लिए यदि नि:शुल्क बाथरूम हो, तो इसका यह मतलब नहीं है कि सेवा प्रदाता को बाथरूम में कैमरा लगाने की छूट मिल गई है। यह सरासर निजता का उल्लंघन होगा।
जब डाटा और सामग्री को आपकी ओर धकेला जाता है, तब आपके मन में जो विचार पहले से चल रहे होते हैं, वे भी प्रभावित होते हैं, जिसका आपको एहसास तक नहीं होता। आप अपनी पसंद की स्वतंत्रता खो चुके हैं। जरा कल्पना कीजिए कि जब आपको एहसास न हो लेकिन आपका मस्तिष्क किसी खास फिल्म/ सितारे, जाति/धर्म, या किसी खास उत्पाद चाहे वह अच्छा हो या बुरा, के प्रति झुकने लगे। इसे ही मैं निजता और स्वतंत्रता को बेचना कहता हूं।