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कुपोषण से लड़ने की प्रतिबद्धता

हीना गावित Published by: हिना गावित Updated Sat, 06 Feb 2021 09:29 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर

अधिकांश क्षेत्रों में प्रसव पूर्व देखभाल (एएनसी) के मामलों में देखा जाए, तो आंगनबाड़ी केंद्रों और अस्पतालों में कराए जाने वाले पंजीकरण में स्पष्ट रूप से असमानता देखने को मिलती है। सुदूर क्षेत्रों में तो संस्थागत प्रसव का चलन ही नहीं है। ऐसे में गर्भधारण के पश्चात खान-पान एवं नियमित स्वास्थ्य परीक्षण की सुविधा नहीं मिलने से कुपोषित बच्चों का जन्म लेना स्वाभाविक है। हालांकि सरकार की तरफ से गर्भवती माताओं और बच्चों के पोषण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। संस्थागत प्रसव सुनिश्चित कराने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन भी दिया जाता है। फिर भी कुपोषण आज देश के समक्ष एक बड़ा संकट है। दुर्भाग्य है कि कुपोषण ज्यादातर बच्चों से संबंधित विषय है और बच्चे वोट बैंक नहीं होते, इसलिए राजनेताओं का ध्यान इन पर कम ही जाता है। जबकि यही बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं। कुपोषण से पहले ही उसके रोकथाम के बारे में हमें सोचना होगा।



कुपोषण का सीधा संबंध लोगों की जागरूकता से है। ज्यादातर महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी) की शिकायत होती है। इससे निपटने के लिए हमें किशोरियों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। बच्चों को ही उनके स्वास्थ्य के विषय में जागरूक करने पर भविष्य में हमें कुपोषण की चिंता नहीं करनी होगी। गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के पोषण पर ध्यान देने के लिए आंगनबाड़ी सेविकाओं और आशा कार्यकत्रियों की अहम भूमिका है। अति-कुपोषित बच्चों को चिह्नित कर पोषण पुनर्वास केंद्रों में भेजना और इलाज के पश्चात बच्चों के माता-पिता को जागरूक करना बेहद आवश्यक है, ताकि बच्चे दोबारा कुपोषित न हों। उन्हें बताना होगा कि उनका खान-पान कैसा होना चाहिए। भारत में स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जन-जागरूकता अभियानों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए महिला स्वयं सहायता समूहों को सक्रिय रूप से शामिल करना जरूरी है। समूह की महिलाएं अन्य महिलाओं के सीधे संपर्क में रहती हैं। ग्रामीण स्तर पर इनकी भागीदारी सुनिश्चित करने से जहां महिलाओं को प्रतिनिधित्व का मौका मिलेगा, वहीं जमीनी स्तर पर लोगों के व्यवहार मेंभी परिवर्तन होगा। इससे पोषण अभियान को भी बल मिलेगा और बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।


पहले जब कुपोषण की बात होती थी, तो महाराष्ट्र के नंदूरबार का नाम सबसे पहले लिया जाता था। चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस) के आंकड़ों में नंदूरबार में कुपोषित बच्चों की संख्या अधिक थी। हाल ही में जारी एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट में नंदूरबार की सूरत बदली है। पांच वर्ष की उम्र तक के बच्चों में पोषण की स्थिति को मापने के मुख्य संकेतक नाटापन (उम्र के अनुपात में ऊंचाई) के मामले में दो फीसदी (एनएफएचएस 2015-16 में 47.6 फीसदी और एनएफएचएस 2019-20 में 45.8 फीसदी) की गिरावट हुई है। इसी तरह दुबलापन (उम्र के अनुपात में वजन) के मामले में भी लगभग नौ फीसदी (एनएफएचएस 2015-16 में 39.8 फीसदी और एनएफएचएस 2019-20 में 30.7 फीसदी) का अंतर है। तमाम चुनौतियों के बीच जमीनी स्तर पर ये बदलाव हमारे लिए बड़ी उपलब्धि हैं। 


इन सकारात्मक संकेतकों का असर मातृ-शिशु के स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। संयुक्त प्रयासों से हम तय नीतियों को सुचारू ढंग से लागू कर पाए। निकट भविष्य में आंकड़ों में और अधिक सुधार आना तय है। कुपोषण से जंग जीतने के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता, जिला प्रशासन की इच्छाशक्ति और स्थानीय जन समुदाय की सहभागिता के साथ जमीनी स्तर पर सभी जिम्मेदार सरकारी महकमों का आपस में बेहतर तालमेल होना बेहद अहम है। कुपोषण मुक्त भारत बनाने के संकल्प को साकार करने के लिए हमें इस रूप में एकजुटता दिखानी होगी। 

(-लेखिका नंदूरबार, महाराष्ट्र से भाजपा सांसद हैं।)

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