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मूर्तियां गिराने पर इतना शोर

तवलीन सिंह Updated Sun, 11 Mar 2018 07:28 PM IST
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तवलीन सिंह

वाह रे भारत महान, तेरा भी क्या कहना! जितना शोर हमने पिछले सप्ताह मूर्तियों के गिराए जाने पर सुना, उतना उन बेचारे मुसलमानों और दलितों के लिए नहीं सुना, जो पिछले तीन वर्ष में गोहत्या के नाम पर मारे गए हैं। हां, जब मोहम्मद इकलाख की हत्या हुई थी, तब देश भर में अफसोस और मातम हुआ था। लेखकों और बुद्धिजीवियों ने अपनी पुरस्कार वापस करने की मुहिम शुरू की और सहनशीलता के समाप्त होने का भी मातम किया था हमने। उसके बाद कई गरीब मुसलमान, दलित किसान और कसाई पिटे और मारे भी गए, लेकिन हम औपचारिक अफसोस से आगे नहीं बढ़े। लेकिन इन मूर्तियों के गिराए जाने पर ऐसा हल्ला मचा, जैसा शायद ही पहले मचा होगा।



रोना-धोना तब शुरू हुआ, जब त्रिपुरा में कुछ सिरफिरे हिंदू कट्टरपंथियों ने भाजपा के विजयी होने के बाद रूसी क्रांति के नायक लेनिन की प्रतिमा गिरा दी। लेनिन की प्रतिमा उस बीते दौर की प्रतीक थी। जब मैंने ट्वीट किया कि लेनिन की मूर्ति के गिराए जाने पर मुझे कोई अफसोस नहीं, क्योंकि मेरी नजर में पूर्व सोवियत संघ में वह एक ऐसी क्रांति लाए थे, जिसने मानव जाति से मानवता छीन ली थी। यह मेरी राय है और सोशल मीडिया के उसूलों के मुताबिक, सबको अपनी बात कहने का अधिकार है। लेकिन मेरे इस ट्वीट के बाद गालियों का पहाड़ टूट पड़ा।


जाने-माने टीवी ऐंकरों ने मुझे टोकते हुए याद दिलाया कि सवाल लेनिन की विचारधारा का नहीं है, सवाल देश में कानून-व्यवस्था कायम रखने का है। देश के ये ऐसे शुभचिंतक हैं, जिन्होंने शायद टीवी स्टूडियो के बाहर कभी कदम नहीं रखे होंगे, वर्ना वे बहुत पहले जान गए होते कि अपने इस भारत महान में कानून-व्यवस्था उनके लिए है, जो अपने बल पर, अपनी दौलत के बल पर इसे हासिल कर सकते हैं, इस देश के आम आदमी के लिए नहीं है। इस कड़वे सच के सैकड़ों सबूत पेश किए जा सकते हैं, लेकिन एक काफी है। क्या हम इतनी जल्दी भूल गए हैं उस बेचारे बस कंडक्टर को, जिस पर हरियाणा में गुरुग्राम के रायन स्कूल के नन्हे प्रद्युम्न की हत्या का आरोप थोप दिया गया था? क्या हम भूल गए हैं कि अशोक कुमार को जेल से तब छोड़ा कानून-व्यवस्था के हमारे पालकों ने, जब सीबीआई ने बताया कि वह बेचारा बिल्कुल निर्दोष था?


कानून-व्यवस्था का इतना बुरा हाल है अपने देश में कि छोटी-छोटी बच्चियों का अक्सर बलात्कार होता है और अगर मुकदमा चलता है, तो दशकों तक चलता रहता है। शहरों में कम से कम जगह-जगह पुलिस थाने तो देखने को मिलते हैं और अदालतें भी दूर नहीं हैं, लेकिन इस देश के देहातों में ऐसे अनेक इलाके हैं, जहां कानून-व्यवस्था को अपराधियों और बाहुबलियों के हवाले कर दिया गया है। उनकी ताकत इतनी है कि कोई ईमानदार पुलिस अफसर अगर इनके साथ सख्ती करने की कोशिश करता है, तो उसका तबादला फौरन करवा दिया जाता है। कानून-व्यवस्था की हालत यह है कि कई प्रदेशों में जब यही बाहुबली और माफिया डॉन चुनावों में खड़े होते हैं और बंदूक की नोक पर वोट हासिल कर संसद या विधानसभाओं में पहुंच जाते हैं, तो इनकी हिफाजत के लिए हमारे पैसों से तैनात किए जाते हैं वही सुरक्षा कर्मी, जो पहले उन्हें जेल में डालने की कोशिश किया करते थे।

 

सो जिन्हें नाज है हिंद पर, मेहरबानी करके वे भारत में कानून-व्यवस्था के न होने पर मातम मनाएं। और पत्थर की कुछ मूर्तियों के गिराए जाने पर अपने आंसू  बर्बाद न करें। 

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