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अलग रास्ते पर चंद्रबाबू!

आर राजगोपालन Updated Fri, 09 Mar 2018 07:44 PM IST
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चंद्रबाबू नायडू

तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) के दो केंद्रीय मंत्रियों का नरेंद्र मोदी सरकार से इस्तीफा देना एक बड़ा घटनाक्रम है, जिसका राजग के भविष्य पर असर पड़ सकता है। हालांकि आंध्र प्रदेश में भाजपा का यह भरोसेमंद सहयोगी अब भी राजग में है। आंध्र में भाजपा का अस्तित्व नहीं है, लेकिन पहली बार मतदाता नरेंद्र मोदी के तकनीकी परिवर्तन और विकास मॉडल के प्रति दिलचस्पी दिखा रहे हैं। तेदेपा और भाजपा के बीच युद्ध जैसी स्थिति बनाने में दोनों पक्षों का योगदान है। चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि तेदेपा ने राज्य हित में केंद्र से अपने मंत्रियों को वापस लेने का 'दर्दनाक निर्णय' लिया है, क्योंकि उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि केंद्र विशेष श्रेणी के राज्यों के बराबर आंध्र को अनुदान देकर खुश था, लेकिन नायडू की मांग के अनुसार विशेष श्रेणी का दर्जा देना असंभव है, क्योंकि 14वें वित्त आयोग ने पूर्वोत्तर और तीन पहाड़ी राज्यों को छोड़कर अन्य सभी के लिए इस योजना को रद्द कर दिया है। लेकिन नायडू का कहना है कि जेटली के शब्द आहत और अपमानित करने वाले थे।



असल में केंद्रीय बजट पेश होने के बाद से ही तेलुगू देशम पार्टी परेशान है। अगले साल राज्य में विधानसभा और लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, इसका भी उस पर भारी दबाव है। उधर विपक्षी दल उस पर आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र में साझेदार होने के बावजूद नायडू राज्य को विशेष दर्जा दिलाने में विफल रहे।


भाजपा और तेदेपा के बीच के इस दरार को तीन प्रमुख पहलुओं के आधार पर विश्लेषित किया जा सकता है। पहला, सरकारी स्तर पर, दूसरा विशुद्ध राजनीतिक नजरिये से और तीसरा भविष्य  के लिहाज से। केंद्र के साथ चंद्रबाबू नायडू और तेदेपा का रिश्ता वर्ष 2014 और 2015 में बेहद अच्छा रहा, लेकिन 2016 में यह रिश्ता दुःस्वप्न में बदल गया।


तेदेपा और भाजपा की सरकारों ने आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा और विशेष अनुदान के मुद्दे पर आधिकारिक स्तर पर विचार-विमर्श किया था। सबसे पहले दोनों सरकारों के रिश्ते खराब हुए, क्योंकि केंद्र का मानना है कि नई दिल्ली से भेजे गए अनुदान को सही तरीके से खर्च नहीं किया गया और आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा केंद्र सरकार को कोई उपयोगिता प्रमाणपत्र (धन खर्च किए जाने से संबंधित) नहीं सौंपा जा रहा है। आंध्र के प्रति मोदी सरकार का दृष्टिकोण तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे दूसरे दक्षिणी राज्यों के समान ही था।


नायडू जो राजनीतिक खेल कर रहे हैं, उसे नरेंद्र मोदी समझ रहे हैं। नायडू अपने धुर विरोधी वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी के मामले में तेजी से कार्रवाई चाहते हैं। रेड्डी चंद्रबाबू नायडू के असली दुश्मन बन गए हैं। तेदेपा के मुताबिक जगन मोहन पर सीबीआई और आयकर विभाग के छापे में केंद्र और भाजपा ने न केवल सुस्ती दिखाई, बल्कि भाजपा तो वाईएसआर कांग्रेस के साथ सौदा कर रही थी। 2015 की शुरुआत का एक अन्य मामला यह है कि नायडू विधायकों को खरीदने के मामले में विवाद में फंसे हुए हैं। इस मामले में तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के नेता तथा तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने नायडू के खिलाफ एक आपराधिक मुकदमा दायर किया है। केसीआर चाहते हैं कि नायडू की गिरफ्तारी हो, लेकिन मोदी ने इन दोनों युद्धरत मुख्यमंत्रियों के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की, क्योंकि दो राज्यों में आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद कटुता बहुत ज्यादा बढ़ गई थी।


चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन को हटाने की भी मांग करते रहे हैं, क्योंकि उन्हें संदेह है कि राज्यपाल आंध्र के हित के खिलाफ केंद्र के एक एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं। नायडू ने नए राज्यपाल के लिए पांच बार प्रधानमंत्री से आग्रह किया है। लेकिन मोदी ने उनकी मांग नहीं मानी और नरसिम्हन को राज्यपाल बनाए रखकर नायडू पर दबाव बढ़ा दिया।


भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आंध्र प्रदेश का दौरा कर नायडू के दृष्टिकोण की आलोचना कर चुके हैं। पूर्व कांग्रेस नेता और भाजपा की आंध्र इकाई की प्रमुख पुरंदेश्वरी, जो संयोग से नायडू की रिश्तेदार भी हैं, तेलुगू देशम पार्टी की घनघोर विरोधी हैं और उन्होंने राज्य की राजधानी अमरावती के निर्माण में भ्रष्टाचार और देर करने की रणनीति को उजागर किया है। कहा जाता है कि 2017 के प्रारंभ में अमित शाह ने एक बार नायडू को कहा था कि मोदी सरकार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार की तरह नहीं है कि दबाव की रणनीति से फायदा उठाया जा सके या उसे भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया जा सके। आैर केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफे के बाद उनसे बात की। प्रधानमंत्री ने पिछले एक साल से नायडू को मिलने का समय नहीं दिया है। केंद्र आंध्र सरकार से स्वीकृत अनुदान के खर्चों का ब्योरा मांगता है, लेकिन नायडू कोई जवाब नहीं देते। वर्ष 2014 से 2016 के बीच प्रधानमंत्री मोदी और नायडू के बीच हुई 16 बैठकों में नायडू ने विशेष अनुदान के रूप में करोड़ों रुपये मांगे। लेकिन देश के अन्य 28 राज्यों का ख्याल रखने की जिम्मेदारी भी केंद्र सरकार पर है। सिंगापुर, कोरिया, जापान के साथ बड़ी परियोजनाओं के लिए सहमति पत्र में केंद्र ने आंध्र प्रदेश की गारंटी ली। नायडू ने मीडिया में सुर्खियां बनाईं, लेकिन जमीनी स्तर पर उन्होंने कुछ नहीं किया और आय-व्यय के मामले में भी आंध्र सरकार पारदर्शी नहीं है। भाजपा को इसी क्षण का इंतजार था, क्योंकि मोदी और शाह, दोनों महसूस कर रहे थे कि नायडू अपनी सीमा लांघ रहे हैं और गठबंधन धर्म की लक्ष्मण रेखा पार कर रहे हैं।
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तेदेपा को कई तूफानों का सामना करना है। 2018 की राजनीतिक अशांति को आसानी से हल किया जा सकता है, लेकिन तेदेपा के सामने विकल्प बहुत कम हैं। वह न तो कांग्रेस के साथ जा सकती है और न ही राज्य में वाईएसआर कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर सकती है। केसीआर ने नायडू के लिए तीसरे मोर्चे में शामिल होने का मार्ग भी अवरुद्ध कर दिया है। सवाल है कि क्या नायडू राहुल गांधी के साथ खड़े होंगे।

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