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छोटे-छोटे प्रयासों से खुलती गईं गांठें

Wed, 15 Feb 2017 08:01 PM IST
रमन सिंह
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सार्वजनिक वितरण प्रणाली
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छत्तीसगढ़ अनमोल संसाधनों और अपार संभावनाओं से भरपूर होने के बावजूद लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से कटा रहा। इस वेदना को समझते हुए महान दूरदर्शी और संवेदनशील राजनेता, भारत-रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन की घोषणा की और इस तरह एक नवंबर, 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया। वर्ष 2003 में पहली बार नवगठित राज्य के लिए विधानसभा चुनाव हुए और मुझे मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का अवसर मिला।
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छत्तीसगढ़ का लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र ग्रामीण है और यहां आजीविका का मुख्य साधन कृषि है। मैंने देखा कि हमारे किसान भाई बड़ी मेहनत से फसल उपजाते हैं, लेकिन उन्हें फसल का सही दाम भी नहीं मिलता। मात्र पांच लाख मीट्रिक टन धान समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता था, उस पर भी अनेक बंदिशें थीं। किसानों को मंडियों में कई दिनों तक रहना पड़ता था। उन्हें तुरंत भुगतान भी नहीं मिलता था। यहां से शुरू हुआ तकलीफों का सिलसिला सार्वजनिक वितरण प्रणाली तक जाता था। मैंने तय किया कि इस दुश्चक्र को तोड़ना है। इसलिए धान खरीदी की व्यवस्था ठीक करने से शुरूआत की और खरीदी केंद्रों की संख्या दोगुनी तक बढ़ा दी। कृषि लागत कम करने के लिए कृषि ऋण की ब्याज दर में कमी, खाद, बीज, उपकरण आदि पर अनुदान दिया। सिंचाई के लिए निःशुल्क बिजली दी। इससे जहां कृषि उत्पादन बढ़ा, वहीं हमने धान खरीदने के लिए सरकारी खजाना खोल दिया। धीरे-धीरे समर्थन मूल्य पर धान खरीदी छह गुने से अधिक हो गई, जिससे छत्तीसगढ़ पीडीएस के लिए धान खरीदने वाला देश का दूसरे नंबर का राज्य बन गया। आज हमारी धान खरीदी हो या पीडीएस, दोनों को देश की आदर्श व्यवस्था माना जाता है। हमने जो छोटे-छोटे कदम उठाए, उन्हें एक बड़ी सोच से जोड़ा और बहुत से छोटे कदमों को मिलाकर एक बड़ी क्रांति का जरिया बना दिया, जिससे जनजीवन पर जबरदस्त असर पड़ा।

राज्य के मैदानी अंचलों में ग्रामीण जनता की रोजी-रोटी का मुख्य जरिया यदि कृषि है, तो वन अंचलों में वनोपज। वनोपज यानी, मूल्यवान वन-संपदा, मेवे और जड़ी-बूटियां। मैंने देखा कि आदिवासी भाई-बहनों को अपनी मूल्यवान उपज से बदलकर नमक जैसी बेहद अनिवार्य चीज लेनी पड़ती है, जो ऐसी वस्तु विनिमय प्रणाली थी, जिसमें आदिवासियों की बहुमूल्य सामग्री बिचौलिए साधारण कीमत के नमक से वजन के बराबर तौल पर बदलते थे। यह दुश्चक्र तोड़ने का संकल्प हमने लिया। हमारी सरकार ने अन्नपूर्णा नमक योजना शुरू करके बिचौलियों को बस्तर से बाहर कर दिया। इसकी आलोचना भी हुई कि क्या इतने छोटे से काम के लिए राज्य का गठन हुआ था? तो मेरा जवाब था कि इस छोटे से कदम से जो राहत वनवासियों को मिल रही है, उसे किसी भी मापदंड पर मापा नहीं जा सकता।
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मैंने देखा कि वन क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के बच्चों को पढ़ाई करने में काफी समस्या आती है। वनोपजों का संग्रह करने और रोजी-मजदूरी से जीवन-यापन करने वाले परिवारों पर नक्सली हिंसा का कहर भी टूटता था। ऐसे में इसी स्थान पर रहकर बच्चे आगे की पढ़ाई कैसे करते? इस तरह नक्सल हिंसा प्रभावित अंचलों के बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए, उन्हें बस्तर से बाहर बड़े शहरों में पढ़ाने का निर्णय लिया गया और ‘प्रयास’ आवासीय संस्थाओं की शुरूआत की गई। इस प्रयोग में चमत्कारिक सफलता मिली, जिसके कारण अबूझमाड़, बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा जैसे अंचलों के बच्चे देश के बड़े इंजीनियरिंग, मेडिकल, विधि, प्रबंधन आदि संस्थानों में प्रवेश पाने में सफल हो रहे हैं।

इस तरह तेंदूपत्ता खरीदी तथा नमक के वितरण से शुरू हुई पहल ने आदिवासी अंचलों में नई उम्मीदों के अनेक रास्ते बनाए और हम एक के बाद एक ऐसी गांठें खोलते चले गए, जो विकास में बाधक थीं। भूख, कुपोषण, पलायन का दुष्चक्र कितना कष्टकारी होता है, इसे भुक्तभोगी ही जान सकता है। मैंने भुक्तभोगी की नजर से देखा, तो ‘मुख्यमंत्री खाद्यान्न योजना’ का आगाज हुआ। जिसके माध्यम से हमने एक ऐसा सेतु बनाया, जिससे भूख, कुपोषण और पलायन की खाई से हमारा ग्रामीण और गरीब छत्तीसगढ़ बाहर निकल आया। इस तरह हमें एक रुपया किलो चावल वितरण और इससे भी आगे बढ़कर देश का पहला ‘खाद्यान्न और पोषण सुरक्षा कानून’ बनाने में मदद मिली। सुप्रीम कोर्ट में बरसों से चल रहे खाद्य सुरक्षा संबंधी मामले में देश के प्रमुख जनकल्याणकारी अर्थशास्त्रियों और आंदोलनकारियों ने पुख्ता आंकड़ों के आधार पर खुद ही छत्तीसगढ़ की मिसाल बार-बार रखी है। दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं से लोग छत्तीसगढ़ में यहां की राशन व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए आते हैं। यह प्रदेश इस हद तक गरीब था कि आजादी की आधी सदी बाद भी यहां के लोगों को दो वक्त का भोजन भी नसीब नहीं हो पाता था। हमने यह पूरी तस्वीर बदल डाली। 2003 से लेकर अब तक के इन तेरह बरसों में छत्तीसगढ़ में हमारी सरकार ने कुपोषण, शिशु-मृत्युदर, मातृ-मृत्युदर जैसे तमाम आंकड़ों को घटाकर लाखों अवांछित मौतों को टाला है।

बहुत से अर्थशास्त्रियों और हमारी सरकार के भी बड़े अनुभवी और जानकार लोगों का ऐसा मानना था कि हमारी कल्याणकारी योजनाओं से राज्य का दीवाला निकल जाएगा। लेकिन हमारा यह मानना था कि खनिजों से भरे हुए इस राज्य में कुदरत ने जितनी दौलत दी है, उस पर यहां के हर बच्चे और हर इंसान का बराबरी का हक है, और पूरा हक है। आज छत्तीसगढ़ आर्थिक विकास का गढ़, औद्योगिक विकास का गढ़, शैक्षिक विकास का गढ़, सामाजिक विकास का गढ़ जैसे मापदंडों पर खरा उतर रहा है।
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