आर्थिक विकास की जरूरतों के मद्देनजर देश में आयकरदाताओं की संख्या और देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में आयकर राजस्व के योगदान को बढ़ाया जाना जरूरी है। हाल ही में प्रकाशित विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्टों में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि भारत की जीडीपी में जहां आयकर का योगदान महज 0.54 फीसदी है, वहीं यह चीन में 9.7 फीसदी, अमेरिका में 11 फीसदी और ब्राजील में 13 फीसदी है। वस्तुत: देश की आबादी के महज दो फीसदी लोग ही आयकर भरते हैं। परिणामस्वरूप आयकर देने वाले लोगों की दृष्टि से विकासशील देशों में भारत बहुत पीछे है।
गौरतलब है कि देश में असेसमेंट वर्ष 2016-17 में 3.7 करोड़ रिटर्न फाइल हुए। इनमें से 99 लाख लोगों ने छूट सीमा 2.5 लाख रुपये से कम आय बताई। 1.95 करोड़ लोगों ने 2.5 लाख रुपये से पांच लाख रुपये के बीच आय बताई। 52 लाख व्यक्तियों ने पांच से दस लाख रुपये के बीच आय बताई। 24 लाख लोगों ने 10 लाख रुपये से अधिक आय बताई। 50 लाख रुपये से ऊपर आय बताने वालों की संख्या सिर्फ 1.72 लाख है। पांच लाख रुपये से अधिक आय दर्शाने वाले 76 लाख व्यक्तियों में से 56 लाख वेतनभोगी वर्ग के हैं। देश में कार्यरत 14 लाख कंपनियों में से केवल तीन लाख कंपनियों ने आयकर दिया है। यदि हम आयकरदाताओं के आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो पाते हैं कि जहां संगठित क्षेत्र के वेतनभोगी वर्ग के आयकरदाताओं की संख्या संतोषप्रद है, वहीं असंगठित क्षेत्र तथा उद्योग-कारोबार क्षेत्र से आयकरदाताओं की संख्या और आयकर की राशि का आकार निराशाजनक है। साथ ही इस वर्ग के द्वारा टैक्स चोरी की आशंका का परिदृश्य दिखाई दे रहा है। ऐसे में इन दिनों नए बजट का अध्ययन करने के बाद देश और दुनिया के आर्थिक विशेषज्ञ यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि नए बजट के बाद निश्चित रूप से देश में आयकरदाताओं की संख्या बढ़ सकती है। नोटबंदी के बाद जिन खातों में संदिग्ध जमा दिखाई दे रहा है, ऐसे करीब एक करोड़ खातों की जांच और नए बजट के तहत आयकरदाता बढ़ाने के नए प्रावधानों से अगले वर्ष आयकरदाताओं की संख्या वर्तमान संख्या की डेढ़ गुना तक हो सकती है।
आयकर विभाग ने नोटबंदी के बाद बैंकों में ज्यादा रुपये जमा कराने वालों को कालेधन के मद्देनजर चिह्नित किया है। नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा किए गए 2.50 लाख रुपये तक कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा। केवल उन्हीं खातों की जांच होगी, जो उनके कर रिटर्न से मेल नहीं खाते। सरकार मान रही है कि बैंकों में जमा उच्च मूल्य के नोटों में से 25 से 30 फीसदी बेहिसाबी हो सकते हैं। नोटबंदी के बाद बैंकों में 4.7 लाख करोड़ रुपये की राशि 18 लाख लोगों द्वारा जमा की गई, जिनकी जमा संबंधी न्यायसंगतता पहली नजर में नहीं दिखाई दे रही है। वित्तमंत्री का कहना है कि इस बड़ी धनराशि का एक बड़ा भाग काला धन हो सकता है। बैंकों में जमा कराए गए करीब छह लाख करोड़ रुपये के काला धन होने की आशंका है, यह विमुद्रीकृत किए गए 15.4 लाख करोड़ रुपये का 39 फीसदी हिस्सा है!
केंद्र सरकार आयकर संबंधी जिन नए प्रावधानों को लागू कर आयकरताताओं का आधार बढ़ाना चाहती है, उसके लिए आयकर विभाग की बुनियादी क्षमता भी बढ़ाई जानी चाहिए। यह विभाग पहले ही काम के बोझ में दबा हुआ है। नोटबंदी के तहत जमा धनराशियों की जांच में उसका काम बढ़ने वाला है।