हाल ही में मैंने कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्य मंत्री राजीव प्रताप रुडी को स्किल इंडिया पहल के बारे में बातें करते सुना, जो बता रहे थे कि यह सब कितना अद्भुत है। मैं पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) और इसके कार्यक्रमों को देख रहा हूं। मैंने वैसे लोगों से भी बातचीत की है, जो कौशल विकास पाठ्यक्रम चलाते हैं और युवाओं को प्रशिक्षण देते हैं। उनमें से कुछ वाकई इसके लायक और प्रभावी हैं, जबकि कुछ अन्य केवल कागजों पर ही हैं या फ्रेंचाइजी के रूप में काम करते हैं।
1970 और 1980 के दशक में जो काम आईटीआई अपने यहां पंजीकृत या वहां से बाहर निकले छात्रों के लिए कर रहे थे, एनएसडीसी अब तक वैसा करने में कामयाब नहीं हुआ है। हां, यह आंकड़ा जरूर उपलब्ध है कि कुछ लाख लोगों ने स्किल इंडिया कार्यक्रम और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) के तहत दाखिला लिया है। लेकिन ब्यूटीशियन या प्लंबर का प्रशिक्षण वास्तव में वह शिक्षा नहीं है, जिसे कोई कौशल विकास या कम से कम रोजगार पैदा करने वाली गतिविधि कह सके। हां, दिल्ली-हरियाणा सीमा पर स्थित झज्झर गांव में एक प्रमाणपत्र प्राप्त ब्यूटीशियन का होना नई बात जरूर है, जो गांव की महिलाओं को सजने-संवरने में मदद करेगी। बहुत से लोग कौशल विकास मंत्रालय से इसकी अपेक्षा नहीं करते हैं। ऐसे कई केंद्र हैं, जहां इस पाठ्यक्रम के लिए भारी संख्या में लोग दाखिला कराते हैं, लेकिन पाठ्यक्रम बीच में छोड़ने वालों की संख्या भी बहुत ज्यादा है। इसी तरह प्लंबर या वेल्डर के रूप में प्रशिक्षण लेने का मामला भी पूर्व में आईटीआई से प्रशिक्षण लेने वालों से अलग नहीं है।
इन दिनों कई कौशल परिषद फैशन में हैं-कृषि, सौंदर्य एवं तंदुरुस्ती से संबंधित, बीएफएसआई क्षेत्र, पूंजीगत वस्तुएं, निर्माण, रत्न एवं जेवर, चमड़ा क्षेत्र, मीडिया, रिटेलिंग एवं दूरसंचार आदि। यदि आप गहराई में पड़ताल करेंगे, तो पाएंगे कि कई पाठ्यक्रम ऐसे हैं, जिनमें रोजगार सृजन या नौकरी की गारंटी कहीं नहीं है। मंत्रालय के अनुसार, अब तक बीस लाख युवाओं को कौशल विकास कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित किया गया है, लेकिन बेरोजगारी दर कहीं यह संकेत नहीं देती कि ये लोग कार्यबल का हिस्सा बन गए हैं।
इस कार्यक्रम के तहत जिस तरह के कौशल का प्रशिक्षण दिया जाता है, समस्या उसी में है। उदाहरण के लिए आप बाड़ बांधने, मचान बांधने और सहायक बढ़ई के कोर्स को देख सकते हैं, जिनके तहत कौशल विकास में ऐसा कुछ नहीं जोड़ा जाता, जिससे कोई रोजगार प्राप्त कर सकता है, खासकर ऐसे वक्त में, जब निर्माण एवं रियल एस्टेट क्षेत्र में मंदी चल रही है। इसी तरह स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में लैब टेक्नेशियन के कौशल की कोई स्पष्ट भूमिका नहीं है, जिससे किसी को रोजगार मिले। इन दोनों पाठ्यक्रमों में मौलिक दोष हैं और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण कुछ ही केंद्रों पर दिया जाता है। संभवतः कौशल विकास परिषद को उन पाठ्यक्रमों को निर्धारित करने में सक्षम नहीं बनाया गया है, जिनका रोजगार से सीधा संबंध है। यह प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के सृजन के कारण भी हो सकता है, जिसमें युवाओं को स्वयं ही कोई रोजगार शुरू करने पर मुद्रा ऋण योजना के तहत मदद दी जाती है। इसी तरह पीएमकेवीवाई के तहत नामांकित युवाओं की अनिवार्य आधार संख्या को सत्यापित करने में एनएसडीसी सक्षम नहीं है। जाहिर है, उन आंकड़ों पर संदेह होता है, जो दाखिला लेने वालों, सफलतापूर्वक कोर्स पूरा करने और प्रमाणपत्र हासिल करने वाले छात्रों की संख्या दर्शाते हैं।
उद्योगों को किस तरह के कौशल की तलाश है और उद्योग क्षेत्र में कुशल युवाओं की कितनी कमी है, जिसे भरने की जरूरत है, यह सब जानने के लिए स्पष्ट रूप से कौशल विकास में उद्योग की सहभागिता जरूरी है। इससे न केवल नियोक्ताओं को सही प्रतिभा ढूंढने में मदद मिलेगी, बल्कि रोजगार की तलाश करने वाले छात्रों को भी मदद मिलेगी और उन कौशलों का विकास होगा, जिसकी मांग उद्योगों में है।
मनरेगा रोजगार गारंटी मॉडल के रूप में परिभाषित है, इसके विपरीत पीएमकेवीवाई ऐसी कोई गारंटी नहीं देता और कौशल विकास का प्रमाणपत्र पाने के बाद भी इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आपको रोजगार मिलेगा। जब तक एनएसडीसी भावी कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण केंद्र के रूप में कार्य नहीं करेगा और संभावित नियोक्ताओं के लिए योग्य कर्मचारी की तलाश का केंद्र नहीं बनेगा, कौशल विकास कार्यक्रम काफी हद तक अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाएगा। कुछ वर्ष पहले कर आकलन करने वाले लोगों की आवश्यकता के मद्देनजर सरकार ने टीआरपीएस (कर रिटर्न तैयार करने वाले) कोर्स शुरू किया था, जो यह प्रमाणपत्र पाने वालों को रोजगार सुनिश्चित करता था। यह हालांकि मौसमी रोजगार था, लेकिन कई योग्य लोगों ने अपनी अन्य वित्तीय सेवा कौशल बढ़ाने में इसका इस्तेमाल किया।
जब तक पीएमकेवीवाई नौकरी की गारंटी नहीं देता, इसमें असमानता बनी रहेगी, क्योंकि कुछ पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण लेने वालों की संख्या असाधारण रूप से ज्यादा होगी, तो कुछ कोर्सों में दाखिले के लिए लोगों को खोजना पड़ेगा। अभी कई कौशल विकास केंद्र कौशल विकास कार्यक्रम से लाभ कमा रहे हैं। फिलहाल मंत्रालय पीएमकेवीवाई में जरूरी बुनियादी ढांचे को बढ़ा रहा है, लेकिन जब तक इस प्रयास के लाभ या सफलता को परखने के लिए स्पष्ट रूप से गुणवत्ता के ऑडिट की व्यवस्था नहीं होगी, हम बस केवल उन हुनरों को विकसित किए जाने की उम्मीद कर सकते हैं, जिनका प्रशिक्षण लेने वाले नहीं या बहुत कम हैं। इसके प्रभावी ढंग का क्या यह मतलब है कि कौशल विकास के तहत वैसे कोर्स होंगे, जो अस्तित्व में हैं, लेकिन इन्हें रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा। ऐसे में एक हुनरमंद व्यक्ति योग्य होने का एक गलत अर्थ निकालेगा और बेरोजगार ही रहेगा, जिस स्थिति में वह आज है।
-लेखक आउटलुक मनी के संपादक हैं