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एसआईआर विरोध के साये में चुनाव: तमिलनाडु में कटे सबसे ज्यादा नाम, लेकिन सियासी उबाल सिर्फ पश्चिम बंगाल में

अवधेश कुमार
Updated Tue, 24 Mar 2026 06:45 AM IST

सार

चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों पर चुनाव आयोग और एसआईआर विरोधी अभियान का साया दुर्भाग्यपूर्ण है।
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एसआईआर पर सियासी बवाल - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


भारत की सुरक्षा व्यवस्था अब उस स्थिति में पहुंच गई है, जहां सुरक्षा बलों की कुछ ही टुकड़ियों को एक से दूसरी जगह चुनाव कराने के लिए भेजने की आवश्यकता नहीं। अब भारत में चुनावी हिंसा न के बराबर है। पश्चिम बंगाल अवश्य डरावना अपवाद बना हुआ है, किंतु वहां हिंसा मतदान के दिन से पूर्व और बाद में ही ज्यादा होती है। इन प्रदेशों में केवल असम में भाजपा तथा पुदुचेरी में राजग की सरकार है। बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में द्रमुक तथा केरल में एलडीएफ या वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार है। इस चुनाव में नेतृत्व, विकास, हिंदुत्व जैसे सामान्य मुद्दे तो हैं ही, एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका को विपक्षी दलों ने बड़ा मुद्दा बनाने की रणनीति अपनाई है।


पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस भी दिया जा चुका है। भारत के इतिहास में पहली बार किसी चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस मिला है। इस दृष्टि से देखें, तो यह चुनाव पिछले सारे चुनावों से भिन्न नजर आएगा। हालांकि, एसआईआर को लेकर जैसा विरोध और आरोप-प्रत्यारोप पश्चिम बंगाल से देखने को मिला है, उससे लगता है कि शायद मतदाता सूची से सबसे ज्यादा नाम वहीं कटे हैं। पर सच यह है कि सबसे ज्यादा नाम तमिलनाडु से कटे हैं। तमिलनाडु में एसआईआर प्रक्रिया में 74 लाख 07 हजार 207 लोगों के नाम हटाए गए हैं। पश्चिम बंगाल में करीब 66 लाख लोगों के नाम कटे। केरल में आठ लाख, असम में केवल दो लाख और पुदुचेरी में सबसे कम 77 हजार लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। असम में विशेष पुनरीक्षण कराया गया था। एसआईआर प्रक्रिया के बाद संशोधित मतदाता सूची से संपन्न बिहार चुनाव में राजग को एकपक्षीय बहुमत प्राप्त हुआ। राहुल गांधी द्वारा एसआईआर व चुनाव आयोग के विरुद्ध चलाए सारे अभियान जनता की दृष्टि में निष्फल साबित हुए। बेशक उनकी सभा में भीड़ आती रही, पर जमीन पर कहीं भी एसआईआर मतदाताओं के बीच मुद्दा नहीं बन सका। छोटी-मोटी परेशानियों और एकाध विवादों को छोड़कर आम लोगों को एसआईआर से कोई समस्या नहीं हुई।


मगर ममता बनर्जी राहुल गांधी नहीं हैं। पश्चिम बंगाल इस समय ऐसा राज्य साबित हो रहा है, जिसके लिए कोई प्रक्रिया, विधान किसी तरह का सांविधानिक पद, केंद्र सरकार की योजनाएं आदि की स्वीकृति और अस्वीकृति ममता बनर्जी की मनमर्जी पर है। उन्होंने एसआईआर को इस तरह पेश किया, मानो यह वास्तविक मतदाताओं और विशेषकर तृणमूल समर्थकों को सूची से बाहर निकालने का भाजपा के षड्यंत्र के तहत चुनाव आयोग द्वारा चलाया जा रहा अभियान है। इसे मुस्लिम विरोधी भी बताया जा रहा है। वह स्वयं काला कोट पहनकर सुप्रीम कोर्ट तक गईं। इतिहास में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने ऐसा किया। मगर शीर्ष अदालत ने एसआईआर प्रक्रिया को सही ठहराया और लगभग 60 लाख तार्किक विसंगतियों के निराकरण के लिए विभिन्न राज्यों के न्यायाधीशों को जिम्मेदारी सौंपी।


ममता बनर्जी ने इसे भी मुद्दा बनाने की कोशिश की, पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों के कार्य में बाधा डालने का साहस न करें। पश्चिम बंगाल ऐसा पहला राज्य है, जहां चुनाव की घोषणा और आचार संहिता लागू होने के बावजूद संपूर्ण मतदाता सूची उपलब्ध नहीं है। चुनाव आयोग ने कहा है कि एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद पूरक मतदाता सूची जारी की जाएगी। हालांकि, केरल में वाम मोर्चे ने इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनाया है, किंतु कांग्रेस के लिए तो है। तमिलनाडु में एमके स्टालिन के लिए भी यह प्रमुख मुद्दा नहीं है और वहां कांग्रेस चूंकि सीमित भूमिका में है, इसलिए शायद इसकी ज्यादा गूंज सुनाई नहीं पड़ेगी।


तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में भाजपा इतनी सशक्त नहीं है कि वह सरकार बना सके। बंगाल में भी तृणमूल भाजपा में जबर्दस्त टक्कर है। भाजपा जीत गई, तब तो ममता बनर्जी यही कहेंगी कि चुनाव आयोग ने हमें हरा दिया। अगर वह जीत गईं, तो कहेंगी कि एसआईआर प्रक्रिया को जनता ने ठिकाने लगा दिया। यानी चित भी मेरी और पट भी मेरी! वास्तव में चुनाव आयोग और एसआईआर विरोधी अभियान के साये में मतदान होना दुर्भाग्यपूर्ण है। सच्चाई सबके सामने है, परंतु किसी सूरत में विपक्ष के प्रमुख नेता इसे स्वीकार नहीं करेंगे।
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