कानून की ओट में अन्याय झेलना शायद मोहम्मद नाशीद का नसीब है। वरना इस भारत मित्र के अधिकारों की रक्षा में मनमोहन सिंह सरकार इतना न हिचकती। डेढ़ दशक पूर्व राजीव गांधी ने मोहम्मद अब्दुल गयूम का सिंहासन बचाने के लिए भारतीय नौसेना को मालदीव भेजा था।
पिछले वर्ष नाशीद को संगीनों के बल पर हटाकर उपराष्ट्रपति डा मोहम्मद वहीद हसन मानिक ने राष्ट्रपति भवन कब्जाया था। तब भी भारत सरकार नाशीद की गुहार को अनसुनी करती रही। 54 प्रतिशत वोट पाकर पांच वर्षों के लिए राष्ट्रपति निर्वाचित नाशीद को आधी अवधि में ही बेदखल कर दिया गया।
इस प्रवाल द्वीपसमूह पर चीन के जंगी बेडे़ और पाकिस्तान के मजहबी जुनून का विरोध करने का खामियाजा नाशीद को भुगतान पड़ा। ऐसा हुआ क्यों? नशीद छह महीने बाद होनेवाले राष्ट्रपति चुनाव में माल्दीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के घोषित प्रत्याशी हैं। अपार जन समर्थन उन्हें मिल रहा है। कट्टर इस्लामी राष्ट्रपति रहे गयूम के समर्थकों के लिए यह नागवार है। पिछले महीने वहां एक भारतीय अध्यापिका के साथ सामूहिक बलात्कार होने के खिलाफ न सिर्फ उन्होंने आवाज उठाई थी, बल्कि जनांदोलन की चेतावनी दी थी।
राजधानी माले में अत्याधुनिक विमान स्थल से बिना मुआवजा के भारतीय निर्माता कंपनी जीएमआर को रातोंरात खदेड़ देने की घटना पर नाशीद ने राष्ट्रपति की निंदा करते हुए भारत से रिश्ते बिगड़ने की आशंका जताई थी। इस बार नाशीद ने भारत से बस इतनी सहायता मांगी थी कि मालदीव के संविधान की धज्जियां उड़ाकर शासक वर्ग उन्हें चुनाव लड़ने से न रोके। नियमानुसार साल भर जेल में रहने पर मालदीव में प्रत्याशी चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाता है। वहां नाशीद के खिलाफ यही साजिश हो रही है। नाशीद ने भारतीय दूतावास में आकर इसी संदर्भ में मदद मांगी थी।
मालदीव में गयूम की तीन दशकों की तानाशाही को खत्म कर नाशीद के राष्ट्रपति बनने की गाथा का उल्लेख यहां जरूरी है। सलाखों के पीछे से सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने की मिसाल इतिहास में कई मिल जाएंगी। लेकिन मालदीव में श्रमजीवी पत्रकार नाशीद का राष्ट्रपति चुना जाना एक अनोखा दृष्टांत था। एशिया के लघुतम राष्ट्र में दीर्घतम अवधि तक तानाशाह-शासक रहे 71 वर्षीय गयूम को 41 वर्षीय नाशीद ने हराया था। उस प्रवाल द्वीपवलय में लोकशाही का यह प्रथम प्रयोग था।
जीतने के बाद अपने प्रतिद्वंद्वी गयूम के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में नाशीद ने ऐलान किया था कि पराजित राष्ट्रपति को राजकाज में माफिक स्थान दिया जाएगा। तब नाशीद से दक्षिण पूर्वी राष्ट्रों, खासकर भारत को, आशा बंध जाना स्वाभाविक था कि मालदीव आतंकवाद का नया ठिकाना बनने के बजाय लोकतांत्रिक राह पर अग्रसर होकर विकास मार्ग पर चलेगा। नाशीद ने गयूम की जेल में डेढ़ दशक गुजारे हैं। सत्ता के खिलाफ आलोचनात्मक लेख लिखने के कारण उन्हें सजा होती रही। उन पर आतंक फैलाने और राजद्रोह का मुकदमा चला।
जेल की एकांत कोठरी में बंद कर उन पर थूका जाता था, बूट की कील से प्रहार होता था, उन्हें भूखा रखा जाता था। उनके पत्रकार सहयोगी मोहम्मद शफीक को उनके खिलाफ वायदा माफ गवाह बनाने की साजिश भी गयूम ने की। लेकिन नाशीद ने हिम्मत नहीं हारी। नाविक इंजीनियर की डिग्री पाकर बजाय सरकारी नौकरी करने के नाशीद लोकतंत्र लाओ संघर्ष के सरबराह बने तथा श्रीलंका और ब्रिटेन में निर्वासित जीवन बिताया। मगर जैसे ही प्रतिबंध की अवधि खत्म हुई, वह मालदीव लौट गए।
भारत में दफा 144 में चार से अधिक प्रदर्शनकारी साथ नहीं आ सकते, मालदीव में यह संख्या केवल तीन है। मगर नाशीद के समर्थकों ने इसका कई बार उल्लंघन किया। आधुनिक एशिया में सर्वाधिक अवधि तक बंदी रहे लोकतंत्र के सेनानी नाशीद की तुलना लोग नेल्सन मंडेला और सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान से करते हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन्हें अंतरात्मा का कैदी कहा। ऐसे में लोकतंत्र का समर्थक भारत मालदीव के मुद्दे पर अगर खामोश रहता है, तो यह विडंबना ही होगी।