कबीर ने हमेशा देश को परदेस समझा, इसलिए खुश और निर्द्वंद्व रहे-जिसे चाहा गरियाया-लतियाया। कोई भी क्यों न हो, सब की ऐसी-तैसी किए रहे। राजतंत्र में भी संन्यासी राजा के साथ यही करते थे। जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ। आज राज-समाज में कड़वा सच बोलने वाली ऐसी सत्ता नहीं दिखती। जैसे सत्ता और बाजार सब कुछ बिकाऊ। जो बिक न पाए, वह कुंठित, हताश, निराश। मजबूरन पोल-खोल ब्लैकमेलर-आंदोलनकारी-आतंकवादी- मिसफिट।
लेकिन विरोध भी व्यापार है, यह उलटबांसी हरेक की समझ में नहीं आती। यह अनेकांतवाद मोटी अक्ल वालों के पल्ले नहीं पड़ता। जो विवादास्पद हो, वही बिकता है, यही मार्केटिंग का असली फंडा है। वरना क्या पड़ी थी हार्वर्ड वालों को कुंभ का सर्वे करने की। वित्त मंत्री हार्वर्ड से, स्वामी भी हार्वर्ड से। अब देश में कबीर और गांधी का अर्थशास्त्र तो नहीं चलने वाला। वैसे में तो तमाम फैक्टरियां बंद हो जाएंगी।
अब संत भी अरबपति हैं-चोटी-लंगोटी से उनका काम नहीं चलता। मंदिरों में रोज करोड़ों का दान और सोने की ईंटें चढ़ रही हों, तो काले धन की चिंता कौन करे? आयकर वालों से तो गडकरी अकेला निपट लेगा। इसीलिए देश ने धर्मनिरपेक्षता को चुना कि सब गांधी के बंदर हो जाएं-तू कहे न मेरी-मैं कहूं न तेरी। पंचशील-सह अस्तित्व-सहकार-जय हो ठगबंधन की सरकार। जनता नाराज हो जाए, तो पांच साल बाद फिर मौका।
आयाराम-गयाराम हो जाए, तो क्या कहने! कुछ लोगों को कबीर के मुकाबले तुलसी मनुवादी लगते हैं। पर बाबा ने भी कम खरी-खरी नहीं कही है कलिकाल को लेकर...शूद्र, पशु, नारी कहकर उन्होंने सब किए-धरे पर पानी फेर लिया। फिर भी सनातनी उन्हीं के पक्के भक्त हैं। आज अगर वह होते, तो अयोध्या के मुद्दे पर वहीं से चुनाव लड़ जाते और काशी से कबीर की जमानत जब्त हो जाती।
महाकुंभ में अबकी दोनों मिले, तो हाल-चाल पूछा कि भविष्य की क्या योजना है? वहीं यह राज खुला कि दोनों के अनुयायी उनके विचारों के उलट चल रहे हैं। साधु की जाति सबसे पहले पूछी जा रही है। सारे यादव रामदेव के पीछे हैं, तो शंकराचार्यों को कोई पूछ नहीं रहा। फिल्मी कलाकार तक गोलबंद हो गए हैं। मसलन, सारे खान कांग्रेसी हो गए हैं-मोदी के चक्कर में। तो दोनों 2014 के चक्कर में घनचक्कर हो रफूचक्कर हो गए हैं। जाते-जाते यही कह गए-केशव कहि न जाए का कहिए!