आज बुद्धिजीवियों की भूमिका और जिम्मेदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक है। जिस प्रकार की घटनाएं देश में निरंतर घट रही हैं, उनमें बुद्धिजीवियों की चुप्पी, निष्क्रियता चिंतनीय है। भय, आतंक, घृणा, असहिष्णुता और लोकतंत्र के छीजते समय में बुद्धिजीवियों की पहल अधिक आवश्यक है। सत्ता व्यवस्था को बौद्धिक और वैज्ञानिक चेतना के विकास और प्रसार से मतलब नहीं है। पोस्ट-ट्रूथ के दौर में सत्य किनारे किया जा रहा है। राजनीति जहां सत्य से परहेज करती है, वहां बुद्धिजीवी सत्य के साथ निर्भीकतापूर्वक खड़ा रहता है। यह समय तार्किकता, वैचारिकता, सत्यता, सामाजिकता, वास्तविक राष्ट्रीयता और बहुजातीयता के पक्ष में खड़ा होने का समय है।
पचास साल पहले लिखे नॉम चोम्स्की के उस मशहूर लेख पर हमने ध्यान नहीं दिया, जो द रेस्पॉन्सिबिलिटी ऑफ इंटेलेक्चुअल्स शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। वह वियतनाम युद्ध का समय था। उस समय चोम्स्की अपने छात्र जीवन को याद कर रहे थे, जब उन्होंने अमेरिकी लेखक, संपादक और फिल्म आलोचक ड्वाइट मैकडोनल्ड की पॉलिटिक्स में प्रकाशित बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी पर लेखों की एक सीरीज पढ़ी थी। बुद्धिजीवी सत्ता व्यवस्था और सरकार का हिमायती नहीं होता। उसका दायित्व घटना विशेष पर अपनी आपत्ति और प्रतिक्रिया भर दर्ज कराना न होकर उस माहौल का निर्माण भी करना है, जिससे समाज अंधेरी सुरंग में जाने से बच सके। यह सत्यनिष्ठा और निर्भीकता के बगैर संभव नहीं है।
आज अंतोनियो ग्राम्शी की 80वीं पुण्यतिथि है। मुसोलिनी ने ग्राम्शी की गिरफ्तारी के बाद कहा था, हमें इसके दिमाग के सोचने पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। पर यह संभव नहीं हो सका और ग्राम्शी ने जेल में ही प्रिजन नोटबुक्स लिखा। ग्राम्शी पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाया गया था। हमारे देश में कुछ समय से राष्ट्रप्रेमियों की संख्या अधिक बढ़ी है। जिस प्रकार राष्ट्रद्रोह के आरोप मढ़े जा रहे हैं, वह एक नई घटना है, जिसका एक विशेष वैचारिकी से संबंध है। ग्राम्शी के लिए स्कूल (शिक्षा) अधिक महत्वपूर्ण था। विवेक-चेतना और वैज्ञानिक-चेतना का जन्म और विकास यहीं से होता है। उच्च शिक्षा और शोध-अनुसंधान से ही कोई समाज उन्नति करता है। शिक्षण संस्थान बुद्धिजीवियों का निर्माण और विकास करते हैं, जो मुक्त माहौल और संवाद बहुलता के बिना संभव नहीं है।
किसी भी समाज में बुद्धिजीवियों की भूमिका राजनीतिज्ञों से कहीं अधिक होती है। उनके शब्द कर्म में विचार और सिद्धांत आचरण और व्यवहार में कितना ढलते हैं, इसी से उनकी पहचान संभव है। अभी अमेरिका में ट्रंप के विरुद्ध सैकड़ों वैज्ञानिकों ने प्रदर्शन किए हैं। आज बुद्धिजीवियों की सामाजिक सक्रियता अधिक आवश्यक है। दिल्ली में जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के ऋणग्रस्त किसानों के धरने और नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में तीन लाख से अधिक किसानों की आत्महत्या पर भारतीय बुद्धिजीवियों का अधिक ध्यान नहीं रहा है। ग्राम्शी ने जिस प्रतिबद्ध और संकल्पवान बुद्धिजीवी की बात कही है, वे आज भी हैं, पर उनकी संख्या कम है। एक साहसी बुद्धिजीवी ही अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकता है। ग्राम्शी की अस्सीवीं पुण्यतिथि पर हमें बुद्धिजीवियों की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका पर अधिक विचार करने की जरूरत है।