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चारधाम यात्रा : हिमालय का मौन भी कुछ कहता है, श्रद्धा की लहर पर खड़े वे सवाल जिसके उत्तर नहीं किसी के पास

जयसिंह रावत
Updated Thu, 17 Apr 2025 07:00 AM IST

सार

ऐसी योजना पर काम करने की जरूरत है, जिससे चारधाम यात्रा अनवरत जारी रहे और पर्यावरणीय चिंताओं का भी समाधान हो।
 
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चारधाम यात्रा। - फोटो : Istock


राज्य के पर्यटन विभाग के अनुसार वर्ष 2024 में छह करोड़ से अधिक लोग उत्तराखंड आए, जिनमें चारधाम यात्रियों की संख्या 46 लाख से अधिक रही। ये आंकड़े बताते हैं कि धर्म और पर्यटन के इस संगम ने एक असामान्य जनदबाव को जन्म दिया है। उत्तराखंड राज्य गठन के समय वर्ष 2000 में चारधाम यात्रियों की संख्या महज 12.92 लाख थी। 1968 में जब पहली बार बदरीनाथ में बस पहुंची, तब यात्रियों की संख्या करीब 60 हजार थी। मगर अब यह संख्या लाखों-करोड़ों का आंकड़ा छूने लगी है। इसके पीछे बेहतर सुविधा और सुगम यात्रा भी है। हालांकि, विशेषज्ञ बढ़ते जनदबाव को लेकर चिंता जता रहे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, केदारनाथ और बदरीनाथ घाटियों में प्रतिदिन केवल 12 से लेकर 15 हजार तीर्थयात्रियों की वहन क्षमता है, जबकि यहां प्रतिदिन 40 हजार से अधिक यात्री पहुंच रहे हैं।


नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (एनआईडीएम) ने स्पष्ट कहा कि हिमालय एक संवेदनशील पर्वत प्रणाली है, जिस पर भारी निर्माण कार्य और विस्फोट जैसी मानवीय गतिविधियां आपदाओं को न्योता देती हैं। आईआईटी रुड़की की रिपोर्टों में पिछले पांच वर्षों में भूस्खलन की घटनाओं में 27 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। आईआईएम रोहतक ने चारधाम क्षेत्रों की वहनीय क्षमता का अध्ययन कर राज्य सरकार को सौंपी सिफारिशों में तीर्थयात्रियों की संख्या को नियंत्रित करने की सलाह दी है। अंतरराष्ट्रीय संगठन आईपीसीसी व डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने भी हिमालयी क्षेत्र में अनियंत्रित पर्यटन ग्लेशियरों के पिघलने और जल स्रोतों के क्षरण का कारण बताकर भीड़ को लेकर गंभीर चेतावनी दी है।


इन तीर्थ स्थलों पर लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष जो जैविक और अकार्बनिक कचरा छोड़ते हैं, वह एक गहरी चिंता का विषय है। हर यात्रा सत्र में हजारों टन प्लास्टिक, बोतलें, पैक्ड खाद्य सामग्री के रैपर, गुटखा-पान के पाउच और जैविक अपशिष्ट नदी घाटियों, पहाड़ों और वन क्षेत्र में जमा हो जाते हैं। इनका समुचित निस्तारण न होने के कारण यह न केवल स्थानीय जल स्रोतों को प्रदूषित करते हैं, बल्कि वन्य जीवों और स्थानीय निवासियों के जीवन को भी संकट में डालते हैं। नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत लगभग 1,300 किलोमीटर लंबे चारधाम यात्रा मार्ग पर स्थित नगर पालिका, नगर पंचायत और नगर निगम क्षेत्रों में और अन्य नगरों में मल-जल शोधन संयंत्र (एसटीपी) स्थापित हो चुके हैं। लेकिन उन संयंत्रों की वहन क्षमता स्थानीय आबादी के हिसाब से तय है। यात्रा के दौरान उन मल-जल संयंत्रों पर ज्यादा दबाव पड़ जाता है और वे ओवरफ्लो होने लगते हैं।


अब आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार और केंद्र एक ऐसी तीर्थ यात्रा नीति बनाएं, जिसमें श्रद्धा का सम्मान अवश्य हो, लेकिन पर्यावरण और भूविज्ञानियों की चेतावनियों को भी नजरअंदाज न किया जाए। चारधाम क्षेत्रों में प्रतिदिन अधिकतम यात्रियों की संख्या तय की ही जानी चाहिए। इस दिशा में सरकार शुरू में प्रयास जरूर करती है, मगर बाद में फिर अव्यवस्था छा जाती है। इसलिए जरूरी है कि सरकार पंजीकरण और यात्रियों की संख्या तय करने के अपने निर्णय पर अडिग रहे और प्रत्येक यात्री के लिए डिजिटल ट्रैकिंग ईको पास लागू हो। यात्रा प्रबंधन और कचरा निस्तारण में संबंधित ग्राम पंचायतों, नगर निकायों और स्वयंसेवी संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। हेलिकॉप्टर सेवाओं के समय और मार्ग सीमित करने के लिए वन्यजीव विशेषज्ञों की अनुशंसा को लागू किया जाए।


हिमालय मौन है, पर दरक रहा है। गंगा की धारा पवित्र है, पर उसमें प्लास्टिक तैर रहा है। यात्रा पवित्र है, पर प्रदूषण करना अविवेक है। सरकार को चाहिए कि वह सुविधा व सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करे। श्रद्धालुओं को चाहिए कि वे हिमालय की आत्मा को समझें और संयमित आचरण अपनाएं। 2013 की केदारनाथ आपदा से सबक लेते हुए सरकार के साथ ही श्रद्धालुओं को विवेक से काम लेना चाहिए, ताकि पहाड़ भी बचे रहें और चारधाम यात्रा भी अनवरत चलती रहे।      
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